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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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४४ रसखान-ग्रन्थावली

१ प्रेम-वाटिका का एक दोहा यह है— 'कमल तन्तु सो छीन अरु, कठिन खडग की धार । अति सूधो टेढो बहुरि, प्रेम-पंथ अनिवार ॥' इसी भाव से मिलता-जुलता बोधा कवि का यह सवैया है— 'अति खीन मृनाल के तारहु ते, तिहि ऊपर पाँव दै आवनो है । सुई बेह ते द्वार सकीन तहाँ, परतीत को टाडो लदावनो है । कवि बोधा अनी घनी तेजहुँ ते, चढि तापै न चित्त डिगावनो है । यह प्रेम को पथ करार महा, तरवार की धार पै धावनो है ॥' इस तुलनात्मक अध्ययन से श्री वटेकृष्ण का यह अनुमान है कि प्रेम- वाटिका की रचना बोधा के पश्चात् हुई है। शिवसिंहसरोजकार के अनुसार बोधा का जन्म-काल संवत् १८०४ है। आचार्य शुक्ल ने इनका कविता-काल संवत् १८३० से १८६० तक माना है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि प्रेम-वाटिका की रचना संवत् १८६० के पश्चात् हुई । २ अपनी इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए श्री वटेकृष्ण ने प्रेम-वाटिका के इस दोहे की ओर संकेत किया है— 'बिधु सागर रस इन्द्र सुभ, वरस सरस रसखान । प्रेम-वाटिका रचि रुचिर, चिर हिय हरषि बखान ॥' और इसमे 'रस' शब्द को ६ अंक का संकेत मानकर प्रेम-वाटिका का रचनाकाल संवत् १६७१ निर्धारित किया है । श्री वटेकृष्ण की यह मान्यता संगत नही है। जहाँ तक पहले आक्षेप का सम्बंध है, उसके प्रत्युत्तर मे दो बाते कही जा सकती हैं। पहली बात तो यह है कि रसखान ने बोधा के सवैया से भाव-ग्रहण किया है, बोधा ने रसखान के दोहे से नही, इस बात का क्या प्रमाण है ? दूसरी बात यह कि स्वच्छन्द धारा के कवियो ने प्रेम को 'टेढा', 'सोधा', 'खडग की धार' आदि बताया है। उदा- हरण के लिए घनानन्द का यह सवैया देखिए— 'अति सूधो सनेह को मारग है, जहा नेकु सयानप बाँक नही । तहाँ साँचे चलै तजि आपुनपौ, झझकैं कपटी जे निसॉक नही ।

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