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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ४३

३१. गंगा महिमा—इस विषय के रसखान के दो छंद हैं जिनमें गंगा की महिमा का वर्णन किया गया है। ३२. शिव-महिमा—इस विषय का केवल एक छंद प्राप्त है जिसमें शिव की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। यही सुजान रसखान का प्रतिपाद्य है। इस प्रतिपाद्य पर दृष्टि डालने से यह अनायास ही सिद्ध हो जाता है कि अपने काव्य के उपलब्ध लघु कलेवर में भी रसखान ने उन सभी विषयों को समाविष्ट करने का प्रयास किया जो कृष्ण- काव्य के लिए महत्त्वपूर्ण और आवश्यक है। इस प्रतिपाद्य को देखते हुए यह अनुमान लगाना असंगत नहीं कि रसखान के अभी बहुत सारे छंद ऐसे हैं जो प्राप्त नहीं हुए, क्योंकि रसखान जैसा भक्त और भावुक कवि कृष्ण-विषयक किसी-किसी लीला का एक-दो छंदों में ही वर्णन करके रह जाये, यह बात मान्य नहीं है। 'भक्तमाल-प्रदीपन' में रसखान के सहस्रों कवित्तों का उल्लेख है। इसका तात्पर्य यह है कि उस समय रसखान के निश्चय ही हजार के लगभग (हजार से कुछ थोड़े अथवा कुछ अधिक) छंद अवश्य प्रचलित रहे होंगे। जो कवि केवल प्रेम को लेकर ही एक पुस्तक की रचना कर सकता है, उसने निश्चय ही कृष्ण-लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया होगा। रसखान के भक्तिकाल की लम्बी अवधि भी इस अनुमान की पुष्टि करती है। अतः जब तक रसखान के अन्य छंद प्राप्त नहीं हो जाते, तब तक उपलब्ध छंदों पर ही परितोष करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है। प्रेम-वाटिका— रसखान की दूसरी महत्त्वपूर्ण कृति प्रेम-वाटिका है जिसमें ५३ दोहों में प्रेम के स्वरूप का विस्तार से वर्णन किया गया है। इस स्वरूप का उल्लेख करने से पूर्व प्रेम-वाटिका की प्रामाणिकता पर विचार कर लेना आवश्यक है। अनेक विद्वानों की यह धारणा है कि प्रेम-वाटिका रसखान द्वारा रचित नहीं है और इस धारणा का मुख्य आधार प्रेम-वाटिका की किसी हस्तलिखित प्रति का प्राप्त न होना है। श्री बटेकृष्ण ने अनेक उक्तियों द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह कृति किशोरीलाल गोस्वामी (प्रेम-वाटिका के सर्व प्रथम सम्पादक) की है। श्री बटेकृष्ण के तर्क ये हैं—