रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ रसखान-ग्रन्थावली प्रेम भी अवर्णनीय है। जो व्यक्ति प्रेम-पाश मे बँधकर मर जाता है, वह अमर हो जाता है। प्रेम के विविध रूप हैं। इसीलिए कोई इसे फाँसी कहता है, कोई तलवार, कोई नेजा, कोई भाला, कोई तीर और कोई प्राणरक्षक अनोखी ढाल। इसीलिए प्रेम को सब प्रकार की युक्तियो मे श्रेष्ठ माना गया है। इसी प्रेम के नियमो से ही ससार का चक्र चल रहा है। प्रेम मे इतनी शक्ति होती है कि स्वयं भगवान् भी इसके आधीन रहते है। रसखान ने गोपियो के प्रेम को आदर्श प्रेम माना है। कहने का भाव यह है कि प्रेम ही सर्वोत्कृष्ट सत्ता है और यही जड-चेतन समस्त पृथ्वी का नियामक है। दानलीला दानलीला के ११ छंद प्राप्त है। डॉ० याज्ञिक इसे संदिग्ध रचना मानते है। अपनी मान्यता का आधार वे इन शब्दो मे प्रस्तुत करते हैं— १. स्व-रचित छंदो मे अपना कवि-नाम देने की प्रवृत्ति रसखान मे विशेष रूप से पाई जाती है। रसखान के छाप-रहित सवैया संख्या मे नगण्य ही है, किन्तु दानलीला के ११ छंदो मे केवल एक ही छंद मे 'रसखान' शब्द आया है। 'प्रेमवाटिका' के ५३ दोहो मे भी १० वार श्लिष्ट अथवा स्पष्ट नाम मे कवि की छाप मिलती है। २. इस छंद मे 'रसखानि' शब्द का प्रयोग कृष्ण की उक्ति में राधा को संबोधन करते हुए किया है। रसखान कवि ने अपने मुक्तको मे 'रसखानि' शब्द का श्लिष्ट प्रयोग जहाँ कही किया है, कृष्ण के अर्थ मे किया है, राधा के लिए नही। ३. रसखान कवि मुख्यतः सवैयाकार है। घनाक्षरी का उपयोग तो बहुत थोडा किया गया है। यह प्रवृत्ति दानलीला मे नही देखी जाती, उसमे घना- क्षरी का उपयोग तो सवैया से भी अधिक हुआ है। ४ रसखान के मुक्तक छंदो मे कृष्ण ने राधा अथवा अन्य गोपियो को सम्बो धित करते हुए एक शब्द भी नही कहा है। रसखान की गोपियो के प्रति कृष्ण सदैव मौन ही रहे है, परन्तु दानलीला के कृष्ण मुखर है। यह बात रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही है। ५. रसखान के मुक्तको मे दानलीला-सम्बन्धी कुछ उत्कृष्ट और लोकप्रिय छंद मिलते हैं। ये छंद राधा अथवा गोपियो की कृष्ण के प्रति उक्तियां है जो