रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ४७ संवादात्मक कथोपकथन के रूप मे है। यदि दानलीला वास्तव मे रसखान रचित है तो ये छंद उसमे क्यों नही स्थान पा सके ? जिस दानलीला मे रस- खान के तद्विषयक लोकप्रिय उत्कृष्ट छंदो मे से एक भी न हो, उसे रसखान रचित मानने मे संकोच होना स्वाभाविक है। इस प्रकार के छंदो के प्रतीक निम्नलिखित है— (१) दानी भये नये माँगत दान सुनै जु तै कस तो बाँधे न जैहौ। रोकत हो बन मे रसखान पसारत हाथ महा दुख पैहौ। टूटै घरा बछरादिक गोधन जो धन है सु सबै धरि दैहौ। जै है अभूषन काहु सखी को तो मोल छला के लला न बिकैहौ ॥ (२) छीर जो चाहत चीर गहे ए जु लेहु न केतिक छीर अँचैहौ। चाखन के मिस माखन माँगत खाउ न माखन केतिक खैहौ। जानति हौ जिय की रसखान सु काहे को एतिक बात बढ़ैहौ। गोरस के मिस जो रस चाहत सो रस कान्ह जु नेकु न पैहौ ॥ (३) नागर छैल है गोकुल मे पग सेकत सग सखा ठिग तै हैं। जाहि न ताहि दिखावत आँख सुकैन गई अब तोसो करै है। हाँसी मे हार हर्यो रसखान जु जो कहूँ नेकु तगा टुटि जै है एक ही मोती के मोल लला सिगरे ब्रज हाटहिं हाट बिकै है ॥ ६ म्युनिसिपल म्यूजियम, प्रयाग की प्रति मे 'दानलीला' के वास्तविक रचियता विषयक कोई सकेत नही है। सभा की खोज के विवरणकार ने इसे रसखान रचित माना है, किन्तु यह मान्यता निराकार जान पडती है। सार यह है कि जब तक कोई पुष्ट प्रमाण प्राप्त न हो, इस दानलीला को रसखान-रचित मानना ठीक नही कहा जा सकता। डॉ० याज्ञिक के ये तर्क काफी सबल है। प्रस्तुत दानलीला की भाषा को देखते हुए भी ऐसा ही लगता है कि ये छंद रसखान द्वारा रचित नही हो सकते। 'पर यहाँ पर एक समस्या और उत्पन्न हो जाती है। सुजान-रसखान मे अब तक