रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ रसखान-ग्रन्थावली जितने छंदो का सग्रह किया गया है, वे छंद इस बात के साक्षी हे कि रसखान कृष्ण भक्ति-विषयक धारा के पूर्णतया अनुसरणकर्ता है। दानलीला इस धारा का प्रमुख प्रतिपाद्य है । सूरदास ने इस लीला का वर्णन बहुत ही विस्तार से किया है। उसके कुछ पद यहाँ उद्धृत करना आवश्यक जान पड़ता है— ग्वालिनि यह भली नहिं करति । दूध दधि घृत [नितहिं बेचति, दान देत डरति । प्रात ही लै जाति गोरस, बेचि आवति राति । कहौ कैसे जानियै तुम, दान मारे जाति । कालिंदी-तट स्याम बैठे, हमहि दियो पठाइ । यह कह्यौ हरि दान मागहु, जाति नितहि चुराइ । तुम सुता ब्रजभानु की, वै बडे नंद-कुमार । सूर प्रभु को नाहिं जानति, दान हाट वाजार । × × × यह सुनि हँसी सकल ब्रजनारि । आइ सुनी री बात नई इक, सिखए हैं महतारि । दधि माखन खैबे कौं चाहत, मागि लेहु हम पास । सूधै बात कहौ सुख पावै, बांधन कहत प्रकास । अब समझी हम बात तुम्हारी, पढे एक चटसार । सुनहु सूर यह बात कहौ जानि, जानती नंदकुमार ॥ × × × दान दिये बिनु जान न पैहौ । जब दैहौ ढराइ सब गोरस, तबहिं दान तुम दैहौ । तुमसो बहुत लेन है मोंकौं, पहिलै ताति सुनाऊँ । चोरी आवति बेचि जाति हौ, पुनि गोरस कहँ पाऊँ । मांगति छाय कहा दिखराऊँ, को दही हमकौं जानत । सूर स्याम तब कयौ ग्वालि सा, तुम मोकौं नहिं मानत ॥ × × ×