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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ४६ कहा हमहिं रिस करत कन्हाई । यह रिस जाइ करौ मथुरा पर, जहँ है कंस कन्हाई । ‘ अब हम कहां जाइ गुहरावैं, बसति तिहारै गाउँ । ऐसे हाल करत लोगनि के, कौन रहै इहि ठाउँ । अपने घर के तुम राजा हो, सब का राजा कंस । सूर स्याम हम देखत बाढे, अब सीखे ये गंस । ✕ ✕ ✕ मौसौ बात सुनहु ब्रज-नारी । इक उपखान चलत त्रिभुवन मैं, तुमसो कहौ उघारी । कबहूँ बालक मुँह न दीजिये, मुँह न दीजिये नारी । जोइ मन करै सोइ करि डारै, मूँड़ चढ़त है भारी । बात कहत अठिलाति जाति सब, हँसति देत कर तारी । सूर कहा ये हमकौ जानै, छाँछहि बेचनहारी ॥ ✕ ✕ ✕ यह जानति तुम नंद-महर-सुत । धेनु दुहत तुमकौ हम देखति, जबहिं जाति खरिकहि उत । चोरी करत यहौ पुनि जानति, घर घर ढूँढत भाँडे । मारग रोकि भए अब दानी, वे ढँग कब तैं छांड़े । और सुनो जसुमति जब बाँधे, तब हम कियौ सहाइ । सूरदासप्रभु यह जानति हम, तुम ब्रज रहत कन्हाइ ॥ कृष्ण-भक्तो की भाँति स्वच्छंद काव्यधारा के कवियो ने भी इस लीला का वर्णन किया है। घनानद ने ‘दानघटा’ शीर्षक के अर्न्तगत इस विषय के १६ छंद लिखे हैं। ‘दानघटा’ और रसखान की ‘दानलीला’ मे बहुत अधिक साम्य है, अतः यहाँ ‘दानघटा’ के समस्त छंदो को उद्धृत करना आवश्यक प्रतीत होता है। ये छंद इस प्रकार हैं— सवैया गोपी— छैल नए नित रोकत गैल सु फैलत कापै अरैल भए हो । लै लकुटी हँसि नैन नचावत चैन रचावत मैन-तए हो ।