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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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५० रसखान-ग्रन्थावली लाज अँचे बिन काज खगो तिनही सी पगो जिन रग रए हौ । ऐंड सबै निकसैगी अबै घनआनंद आनि कहा उनए हौ ॥ १ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — है उनए सु नए न कछू उघटै कित ऐंड घमंड अयानी । बैन बड़े बड़े नैनन के बल बोलति है क्यों इती इतरानी । दान दिये बिन जान न पाइ है आइ है जो भलि खोरि विरानी । आगे अछूती गई सो गई घनआनंद आज भई मनमानी ॥ २ ॥ सवैया गोपी — जाइ करो उहि माय पै लाड़ बढ़ाय बढ़ाय किये इतने जिन । भीत की दौरनि खोरनि है मठता हठ ओरनि सो समझे बिन । दान न कान सुन्यो कवहूँ कहूँ काहे को कौनै दयौ सु लयो किन । तौड़िक लै घनआनंद डाटत काटत क्यो नही दीनता सो दिन ॥ ३ ॥ सवैया श्रीकृष्ण — देहिगी दान जो ऐहै इतै नही पैहै अबै सु किये को सबै फल । बावा दुहाई सुहाई करो जिय जानि कै मानि छुटै न कियें छल । एक ही ओल दै जाहु चली झगरो सगरो मिटि बात परैं सल । नांव पर्यो अबला घनआनद ऐंठति ण्ठति माँहु किते बल ॥ ४ ॥ सवैया गोपी— जीभ सम्हा रे न बोलति हो मुँह चाहत क्यों अब खायां थपेरे । ज्यों उगी करी कछु कानि-कनौड त्यों मूढ चढे बढे आवत नेरै । खाय कहा फल माय जने जिम देखी विचारि पिता-तन हेरै । कज-कनेरहि फेर बडो घनआनद न्यारे [रहो कतौ टेरै ॥ ५ ॥ सवैया श्रीकृष्ण— लेहु भया गहि सीसन ते दधि की मटुकी अब करनि करो कित । जैसे सो तैसे भए ही बनै घनआनद घाम घरो जित की तित ।