रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ५१ एकहि एक बराबरि जाहु करौ अपने अपने चित को हित । फोरि कै क्यौ दुहूँ हाथ सकेदियै जौ बिधना घर बैठे दयो बित ॥ ६ ॥ सवैया गोपी— गोद भरै बित घाम कै जाय घरौ गहि गोद सो माय के आगै । पेट परे को लखै फल ज्यौं निपजै हौ सपूत सु भागनि जागै । बाँटिहै बोलि वधाई कमाई की जाति मैं जाते महा पति पागै । वास दिये को यहै गुन है घनआनंद जो छिन दोप न लागै ॥ ७ ॥ सवैथा मधुमंगल— नंद लला रससागर सों ललिता रिस की सलिला न बढैयै । नागरि आगरि हौ सबु भाँति तुम्हें अब कौन सी बात पढैयै । चोखन तोष नहि उपजै घनआनद क्यौ गुन दोष कहैयै । नेकु ढरे सुधरै सब काज अकाज इतो अपलोक चढ़ैयै ॥ ८ ॥ सवैया ललिता— सुनि रे मधुमंगल । दान-कथा सु जथारुचि होत वृथा हठ है । कर ओड़ि दिखाय दया मृदु है चलियै बहु भाँति बिनै करि नै । घनआनंद ऐंठ अमैठ किये कहा पैयत है रिझवारन पै । गुन गाय रिझयावहु देहि अबै बृषभानलली की निछावर कै ॥ ६ ॥ सवैया सखा— स्याम सुजान सबै गुनखानि बजावत बैन महा सुर साँचनि । अंग त्रिभंग अनंग-भरे दृग भौह नचाय नचावत नाँचनि । कीरतिदा कुलमंडन जौ निरखै भरि नैन बढै सुख-माँचनि । दान हँसे चुकि है घनआनंद रीझ नही सकि है हित-आँचनि ॥ १० ॥ सवैया सखी— आयो सखी चलि कुंज मै बैठि लखै घनआनद की सुघराई ।