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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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५२ रसखान-ग्रन्थावली पाठन देहिं न एक सखै अकिले इन्हें छेकि करै मनभाई । भावती टेक रही बहु भाँति किये न बनै अति ही कठिनाई । लेता हौं राधे बलाय कठ्यौ करि आज मनौ इतनी हम पाई ॥ ११ ॥ राजदुलार भरी इकसार सुभाय मथे मन डारति पी को । कु ज चली सुखपुंज अली सग भाल विराजत लाज को टीको । लोचनि-कोरनि घोरनि छुवै मुसिकानि मैं व्हैं दरसै हित ही को । बोलनि बापुरी डारियै वारि लखै घनआनंद रूप लली को ॥ १२ ॥ रंग रह्यौ सुन जात कह्यौ उनह्वौ सुखसागर कुंज मैं आएँ । फैलि पर्यो रस को फगरो अति ही अगरो निबटै न चुकाएँ । काहूँ संभार रही न पटू तन कौ तन मै घनआनंद छाएँ । प्रेम-पगे रिझवारन की तहँ रीझ कै रीझ ही लेत बलाएँ ॥ दोहा दानघटा मिलि छवि-छटा, रसधारनि सरसाय । जियत पियत और न छियत, रसिक-पपीहा पाय ॥ १४ ॥ दानघटा-रसपान के, चातक रसिक सुजान । चखनि लखत चसके चखत, रखत तृषित ही कान ॥ १५ ॥ दानघटा सीचत सदा, मधुर केलि नव वेलि । आलवाल पचि रचि सुमन, लेत रसिक रस केलि ॥ १६ ॥ इन उद्धरणो को उद्धृत करने से हमारा तात्पर्य केवल यह दिखाना है कि कृष्ण-काव्य के रचयिताओ मे दानलीला का वर्णन करना एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण परम्परा थी । रसखान ने भी इस परम्परा का निश्चय ही पालन किया होगा । इनके नाम से जो दानलीला मिलती है, यद्यपि कुछ बातो को देखते हुए वह रसखान की प्रवृत्ति के अनुकूल नही जान पडती, तथापि यह कहने मे सकोच नही होता कि अनेक बातो मे यह परम्परा की प्रवृत्तियो का अनुसरण करती है, जैसा कि उपर्युक्त सूरदास और घनानन्द के छंदो से प्रकट होता है । इसे रसखान द्वारा विरचित न मानने के दो ही कारण प्रबल है— १ इसकी भाषा रसखान की भाषा से मेल नही खाती । २. सुजान-रसखान मे अनेक पद ऐसे है जो दानलीला से सम्बधित है और उनका इसमे समावेश नही किया गया ।

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