रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ५३
इन कारणों का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है— १. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, किसी भी लोकप्रिय कार्य की भाषा का वही रूप नही मिलता, जो उसने अपनाया है। उनकी भाषा को उनके प्रशंसकों ने अपने अनुसार मोड दे दिये है। उदाहरण के लिए मीरा को लिया जा सकता है। मीरा की भाषा तो अपने मूल स्वरूप को ही छोड़ गई है। उदा- हरण के लिए ये पद देखिए— 'म्हाँ गिरधर रग राती, सैया म्हाँ ।। टेक ।। पचरग चोला पहर्या सखी म्हाँ, झिरमिट खेलण जाती। याँ झिरमिट माँ मिल्यो साँवरो, देख्यां लग मण राती। जिणरो पिया परदेश बस्याँरी, लिख-लिख भेज्याँ पाती। म्हारा पियां म्हारे हीयडे बसताँ, णा आवाँ णा जाती। मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, मग जोवाँ दिण राती ॥ × × × × 'मैं गिरधर रंगराती, सैयाँ मैं ।। टेक ।। पचरंग चोला पहर सखी मैं झिरमिट खेलन जाती। ओह झिरमिट माँ मिल्यो सांवरो खोल मिली तन गाती। जिनका पिया परदेश बसत है, लिख-लिख भेजे पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, का कहूँ आती जाती ॥' एक ही पद की इन दोनों भाषाओ मे आकाश-पाताल का अन्तर है। इसी प्रकार रसखान की भाषा के विषय मे भी कहा जा सकता है कि दानलीला के पदो की भाषा और प्रवृत्ति मे इतना परिवर्तन होना असभव नही है। श्रुति-पथ से चलनेवाली भाषा का एक रूप रहता भी नही है। २ जहाँ तक दूसरे कारण का सम्बन्ध है, इसके विषय में यह कहा जा सकता है कि रसखान ने स्वयं किसी संकलन की योजना नही की। इनके भक्तो ने ही इनके छंदो का सकलन किया है। पहले दानलीला से सम्बन्धित कुछ ही पद मिले होगे जिन्हे सुजान-रसखान मे संग्रहीत कर दिया गया होगा और बाद मे मिलने वाले और पदो को 'दानलीला' शीर्षक के अन्तर्गत रख दिया गया होगा।