रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
समीक्षा भाग ५३
इन कारणों का समाधान इस प्रकार किया जा सकता है— १. जहाँ तक भाषा का सम्बन्ध है, किसी भी लोकप्रिय कार्य की भाषा का वही रूप नही मिलता, जो उसने अपनाया है। उनकी भाषा को उनके प्रशंसकों ने अपने अनुसार मोड दे दिये है। उदाहरण के लिए मीरा को लिया जा सकता है। मीरा की भाषा तो अपने मूल स्वरूप को ही छोड़ गई है। उदा- हरण के लिए ये पद देखिए— 'म्हाँ गिरधर रग राती, सैया म्हाँ ।। टेक ।। पचरग चोला पहर्या सखी म्हाँ, झिरमिट खेलण जाती। याँ झिरमिट माँ मिल्यो साँवरो, देख्यां लग मण राती। जिणरो पिया परदेश बस्याँरी, लिख-लिख भेज्याँ पाती। म्हारा पियां म्हारे हीयडे बसताँ, णा आवाँ णा जाती। मीराँ रे प्रभु गिरधर नागर, मग जोवाँ दिण राती ॥ × × × × 'मैं गिरधर रंगराती, सैयाँ मैं ।। टेक ।। पचरंग चोला पहर सखी मैं झिरमिट खेलन जाती। ओह झिरमिट माँ मिल्यो सांवरो खोल मिली तन गाती। जिनका पिया परदेश बसत है, लिख-लिख भेजे पाती। मेरा पिया मेरे हीय बसत है, का कहूँ आती जाती ॥' एक ही पद की इन दोनों भाषाओ मे आकाश-पाताल का अन्तर है। इसी प्रकार रसखान की भाषा के विषय मे भी कहा जा सकता है कि दानलीला के पदो की भाषा और प्रवृत्ति मे इतना परिवर्तन होना असभव नही है। श्रुति-पथ से चलनेवाली भाषा का एक रूप रहता भी नही है। २ जहाँ तक दूसरे कारण का सम्बन्ध है, इसके विषय में यह कहा जा सकता है कि रसखान ने स्वयं किसी संकलन की योजना नही की। इनके भक्तो ने ही इनके छंदो का सकलन किया है। पहले दानलीला से सम्बन्धित कुछ ही पद मिले होगे जिन्हे सुजान-रसखान मे संग्रहीत कर दिया गया होगा और बाद मे मिलने वाले और पदो को 'दानलीला' शीर्षक के अन्तर्गत रख दिया गया होगा।
५४ रसखान-ग्रन्थावली
इस दृष्टि से विचार करने पर यह निष्कर्ष निकालना कठिन नही कि प्रस्तुत दानलीला मे निहित भाव रसखान के ही है ओर भाषा का परिवर्तन इनके भक्तो की देन है । दानलीला में राधा और कृष्ण का संवाद है, ठीक वैसा ही जैसा सूरदास ओर घनानन्द मे मिलता है । राधा दधि मॉगने पर कृष्ण की भर्त्सना करती है ओर कृष्ण भी उस भर्त्सना का वैसे ही शब्दो मे उत्तर देते है । स्फुट पद— स्फुट पदो के अन्तर्गत पाँच पद संग्रहीत है । प्रथम पद मे कृष्ण ओर गोपी का संवाद है । मार्ग मे जाती हुई किसी गोपी को कृष्ण छेड़ देते है । इस पर वह चिढ जाती है ओर कृष्ण को भला-बुरा कहने लगती है । इसी बात पर दोनो मे वाद-विवाद प्रारभ हो जाता है । यह वाद-विवाद इस प्रकार है— कृष्ण—यदि तू अपने मन मे इतनी होशियार बनती तो इस रास्ते से निक- लती ही क्यो है ? गोपी—यह रास्ता तेरे बाबा का नही है । और न पहले-पहल ही इस रास्ते से जा रही हूँ । पहले भी इस रास्ते से गई थी, तब किसी ने कुछ नही कहा । यह रास्ता तो सभी के चलने के लिए है । अतः तुम हमारा रास्ता क्यो रोकते हो ? हमे छोडकर या तो सीधे-सीधे यहाँ से चले जाओ, अन्यथा हम तुम्हारी शिकायत तुम्हारे पिता नन्द मिहिर से कर देगी । दूसरे पद मे भी गोपी द्वारा कृष्ण की भर्त्सना का वर्णन है । गोपी की फटकारे सुनकर कृष्ण को क्रोध आ जाता है ओर वे उसके सिर से दही की मटकी उतार कर पृथ्वी पर फेक देते है । मटकी फूट जाती है, दही नालियो मे बहने लगती है । तब विवश होकर गोपी उनसे दूसरे दिन मिलने का वचन देती है । तीसरे पद मे फाग का वर्णन है । कोई गोपी अपनी सखी को कृष्ण के साथ फाग खेलने के लिए प्रेरित करती है । चौथे पद मे भी फाग का वर्णन है । कोई गोपी कृष्ण को फाग खेलने के लिए घर से बाहर निकलने के लिए ललकारती है और जब कृष्ण बाहर आ जाते है तो उनसे बिजली की तरह लिपट जाती है ।
५५ समीक्षा भाग पाँचवे पद मे उस विरहिणी गोपी का वर्णन है जिसे सास और ननद ने कृष्ण से फाग खेलने की अनुमति नही दी। संदिग्ध पद इस शीर्षक के अन्तर्गत १० छंद है। डा० याज्ञिक ने अनेक प्रमाणो द्वारा यह सिद्ध किया है कि ये छंद रसखान-रचित नही है। पहला पद है— हेरत कुंज भुजा धरे स्याम सौ नेक तबै हँसती न लुगाई। लाज न कानि हुती जिय माँझ सुभेटत जो मग मांहि कन्हाई। हेरै परै न गुपाल सखी इन जोबन आनि कुमात चलाई। होत कहा अब के पछताए जो हाथ ते छूटि गई लरिकाई॥' यह सवैया किसी रामगोपाल कवि का रचा हुआ है। प्रबोध रस सुधा- सागर मे इसे राजगोपाल के नाम से ही सगृहीत किया गया है। नवीन ने भी इसे राजगोपाल के नाम से ही दो बार उद्धृत किया है। एक बार परकीया के वर्णन मे और दूसरी बार व्रजकेलि के वर्णन मे। सरदार कवि के श्रृंगार- संग्रह मे भी यह छंद रामगोपाल के नाम से ही मिलता है। इस सवैया की तीसरी पंक्ति के पूर्वाद्ध मे रायगोपाल (गुपाल) की छाप भी अंकित है। दूसरा पद है— 'मीरा की चटक और लटक नव कुंडल की, भौंह की मटक मोहि आँखिन दिखाउ रे। मोहन सुजान गुन रूप के निधान कान्ह, बाँसुरी बजाय तन तपन सिराउ रे। ए हो बनवारी बलिहारी जाऊँ तेरी आज, मेरी कुज आय नेक मीठी तान गाउ रे। नंद के किसोर चितचोर मोरपंख बारे, बंसीवारे साँवरे पियारे इत आउ रे॥' 'शिवसिंह-सरोजकार' ने इस कवित्त को आदिल कवि द्वारा रचित माना है। इसीलिए उसने 'मोहन सुजान' के स्थान पर 'आदिल सुजान' पाठ दिया है।
५६ रसखान-ग्रन्थावली तीसरा छंद है— 'तट की न घट परै मग की न पग धरै, घर की न कछु करै बैठी भरै सांसु री । एकै सुनि लोट गई एकै लोट पोट भई, एकनि के दृगनि निकसि आए आंसु री । कहै रसखान सो सबै ब्रज वनिता वधि, वधिक कहाय हाय भई कुल हांसु री । करिये उपाय बांस डारियै कटाय, नाहिं उपजैगो बांस नाहिं बाजै फेरि बांसुरी ॥' 'शिवसिंह-सरोजकार' ने इसे रसनायक कृत माना है और 'कहै रसखान' के स्थान पर 'कहै रसनायक' पाठ दिया है । चौथा पद है— 'भिक्षुक तिहारो कहाँ बलि मखशाला जहाँ, सर्पन को संगी कहाँ व्है है छीरनिधि मे । ऐ री बहुरंगी बैलवारो कहाँ नाचत है, कीने तिरभंगा कही व्है है ग्वालगन मे । चाउर चवैया कहाँ होय है सुदामा पास, विष को अहारी कहाँ पूतना के घर मे । सिन्धु सुता आन मिली तर्क सो तरक करी, गिरजा मुसकाति जाति झारी लिए कर मे ॥ केवल प्रभुदत्त ब्रह्मचारी द्वारा सम्पादित 'रसखान पदावली' मे यह कवित्त रसखान के नाम से मिलता है। यह कवित्त संस्कृत-कवियो की प्रवृत्ति के अधिक निकट है । अतः निश्चय ही यह संस्कृत के किसी श्लोक का अनुवाद है । पाँचवा पद है— 'खेलिए फाग निसंक व्है आज मयंकमुखी कहै भाग हमारो । लैहु गुलाल दुऔ कर मे पिचकारिक रंग हिये महं डारो । भावै सु मोहि करो रसखान जू पांव परो जनि घूंघट टारो । बीर की सौंह हौं देखिहौं कैसे अबीर तो आँख बचाय के डारो ॥'
५७ समीक्षा भाग
'स्वतंत्र भारत' ५ मार्च सन् १६२८ के होली विशेषांक मे श्री पूत्तूलाल शर्मा ने यह सवैया रसखान के नाम से उद्धृत किया है । शर्मा जी को यह सवैया कहाँ से मिला, इसकी ओर कोई संकेत नहीं किया गया है । नवीन कवि इसे रसखान- कृत न मानकर किसी अन्य अज्ञात कवि द्वारा रचित मानते हैं । इस सवैये के अंश 'भावै सुमोहि करो रसखान' के स्थान पर 'भावै तुम्हे सु करो मुहि लालन' पाठ भी मिलता है । नवीन ने वसंत ऋतु के अन्तर्गत फाग-प्रसंग मे इस सवैये को उद्धृत किया है । छठा छंद है — 'नन्द महर के बगर तनु, अब मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥' यह दोहा रसनिधि-कृत 'रतन हजारा' का है । हिन्दी शब्द-सागरकार ने भूल से इसे रसखान का मान लिया है । सातवाँ छंद है— 'सुरतर लतनि चार फल है ललित कैधौं, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधौं चिन्तामनिन की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरे है जोति झलकावनी । प्रभु की कहानी ते गुसाई की मधुर बानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मन भावनी । खाँड की खिजावनी सी कंद की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥' (वर्ष ५, खंड १, श्रावण १६८७ वि० मे) 'कल्याण' मासिक पत्रिका मे यह कवित्त प्रकाशित किया गया था । इसे रसखान-कृत मान लेने का भ्रम सम्भवतः 'मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी' के कारण हुआ है । इसे रसखान-कृत मान लेने का अभी तक कोई दृढ प्रमाण उपलब्ध नही हुआ है ।
५८ रसखान-ग्रन्थावली आठवाँ पद है - 'अंग भभूत लगाये महा सुख है कोउ ऐसो सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिए हरि प्यारो मिलै तो पै कान कटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहौ मिलि गोरख जागै ॥' यह सवैया किसका रचा हुआ है, यह बताना असम्भव है । नवीन ने इसे किसी नाथ कवि का माना है । यह भ्रम नाथ शब्द के कारण हुआ है । यह शब्द नाथपंथियो के लिए प्रयुक्त हुआ है । नवाँ पद है- 'कैसा है यह देश निगोरा । जग होरी ब्रज होरा । मै जल जमुना भरन जात रही, देखि बदन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जियरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नन्द के ने सखि, चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अंग टटोरा । न मानत करत निहोरा ॥' इस पद को श्री अखिलेश मिश्र ने १८ सितम्बर १६६० के 'स्वतत्र भारत' मे रसखान का मानकर उद्धृत किया है । इस भ्रम का कारण 'कहै रसखान' वाक्यांश है । यहाँ रसखान का अर्थ कृष्ण है । दसवाँ पद है- 'परम चतुर पुनि रसिक वर, कैसो हू नर होय । बिना प्रेम रूखो लगै, बादि चतुरई सोय ॥' गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'प्रेमयोग' नामक पुस्तक मे यह दोहा रसखान के नाम से दिया गया है । अन्यथा कोई प्रमाण उपलब्ध नही होता ।
: ४ : रसखान का प्रेम-दर्शन प्रेम शब्द 'प्रिय' का भाववाचक रूप है । 'प्रिय' शब्द का अर्थ है तृप्ति प्रदान करने वाला—प्रीणातीति प्रिय. । अतः प्रेम उस प्रभाव को कह सकते है जो हृदय को आनन्द देकर तृप्त करने वाला हो । प्रेम-भाव की महत्ता असदिग्ध है । इसीलिए भारतीय एवं पाश्चात्य साहित्य दोनो मे इसके स्वरूप का विस्तार से प्रतिपादन किया गया है । भारतीय आचार्यों के एतद्विषयक प्रमुख मत निम्नलिखित है— १ चित्त रूपी समुद्र मे जब सत्त्व गुण का जल भर जाता है तो उसमें दृष्टि, परिचय, हार्द्र तथा प्रेम नाम की चार प्रकार की तरंगे उठा करती है । प्रेम का मूलोपादान आत्मा का सत्त्व गुण है । विषय तो केवल निमित्त कारण है । वह उद्दीपन है और भाव की जिस स्थिति को प्रेम कहते हैं, वह अनुभूति की चरम कोटि है । उसमे पूर्व तीन विकास-क्रम दृष्टि परिचय और हार्द्र समाप्त हो लेते है । इनमे दृष्टि चित्त की वह वृत्ति है जिसमे चंचल चित्त विषय की ओर हठात् प्रवृत्त होता है । परिचय से विषय के विविध संस्कार मन मे उत्पन्न होते है । दोषो पर ध्यान न देना हार्द्र है । जीव मे आत्मा का ही रूप जो रस है वह जिस उपाधि का आश्रय लेकर श्रृं गार बनता है, वह उपाधि प्रेम है; अर्थात् प्रेम रसमय आत्मा के बहिर्विकास का साधन है, उसी का अंभूगत तत्त्व है । —प्रेमरसायनकार विश्वनाथ २. अंत करण की वृत्ति जिससे वस्तु के संयोगकाल मे भी वियोग-सा बना रहता है, प्रेम है । —शांडिल्य ३ चित्त की द्रवावस्था को प्रेम कहते है । —आचार्य भरत
८. उन्माद —उन्माद का अर्थ है पागलपन । प्रेमी में जब अपने प्रिय के प्रति इतना ममत्व आ जाता है कि वह उसके बिना पागल-सा बन जाता है तो उसकी यह दशा उन्माद कहलाती है । उन्माद गुण के उदय होने पर महाभाव की दशा आती है । इस दशा मे सयोग के कल्प निमेष की भाँति और वियोग के निमेष कल्प की भाँति प्रतीत होते हैं । प्रेम के गुणों पर दृष्टिपात करने के उपरात अब यह जान लेना आवश्यक है कि प्रेम के कितने भेद होते हैं । इस वर्गीकरण के तीन आधार हो सकते हैं— १. प्रेम की मात्रा का आधार । २. प्रेम के आलम्बन का आधार । ३. प्रेम के स्वरूप का आधार । प्रेम की मात्रा के आधार पर प्रेम के तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । प्रेम के आलम्बन के आधार पर प्रेम के अपार भेद हो सकते हैं । यथा—देश-प्रेम, जाति-प्रेम, मानव-प्रेम, पशु-प्रेम, पक्षी-प्रेम, पुस्तक-प्रेम, दुग्ध-प्रेम, आदि । प्रेम के स्वरूप के आधार पर प्रेम के दो भेद है—पार्थिव प्रेम और अपार्थिव प्रेम । पार्थिव प्रेम के भी दो भेद होते हैं—प्राकृत प्रेम और सात्विक प्रेम । इन्हे पाश्चात्य आचार्यों ने क्रमशः 'नैच्यूरल लव' (Natural Love) और 'प्लेटोनिक लव (Platonic Love) कहा है । सहज मानव-प्रेम ही को प्रकृत प्रेम कहा जाता है । पार्थिव आलम्बन के प्रति पार्थिव आश्रय की सहज वासनात्मक प्रणयाभिव्यक्तियाँ इसी प्रेम के अन्तर्गत आती हैं । दूसरे शब्दो मे कह सकते हैं कि नर-नारी की सहज प्रीति ही प्रकृत प्रेम है । ऐसे प्रेम का आलम्बन पार्थिव होता है, अत शरीर-सुख की उत्कट इच्छा से प्रेरित होकर जिस प्रेम का निवेदन किया जाता है, वह स्व- भावत ही वासनात्मक होता है। रीतिकालौन काव्य मे ऐसे ही वासनात्मक प्रेम की अभिव्यक्ति है । सात्विक प्रेम इस प्रेम से भिन्न होता है । प्लेटो ने आत्मा की प्रीति का वर्णन किया है । उसने पार्थिव आलम्बन के प्रति अशरीरी अकांक्षा अथवा वासनायुक्त शुद्ध प्रीति और शुद्ध राग को ही सात्विक प्रेम की संज्ञा दी है ।
समीक्षा भाग ६३ सहज ऐन्द्रिय सुख से ऊपर का प्रेम ही आत्मा की प्रीति है। ऐसे प्रेम मे वस्तुतः वासना का परिष्कार एवं उन्नयन हो जाता है और वह वासना त्याग तथा सयम का प्रतिरूप बन जाती है। जिस प्रेम का आलम्बन अपार्थिव हो, उसे अपार्थिव प्रेम कहते हैं। अपा- र्थिव प्रेम को चार भागो मे विभक्त किया जा सकता है— १ अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति । २. सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति । ३. सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना । ४. निर्गुण निराकार के प्रति मानव आत्मा की ज्ञानमूलक आनंदबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति । अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति सगुण साकार के प्रति ही सम्भव है। अतः सगुण और साकार अपा- र्थिव आलम्बन आश्रय की भावना के लिए नितांत आवश्यक है। पार्वती-शिव, राधा-कृष्ण, सीता-राम का शक्ति और परम पुरुष के रूप मे वर्णन अपार्थिव प्रणयमूलक प्रेम है। सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति मे पार्थिव आश्रय सगुण और साकार अपार्थिव आश्रय मे वासना का आरोप कर लेता है। फलत. ऐसे प्रेम मे ऐन्द्रिय भावना का समावेश हो जाता है, किन्तु आलम्बन की अपार्थिवता के कारण ऐन्द्रिय भावना उदात्त रूप मे ही व्यक्त होती है। सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना मे पार्थिव आश्रय का रति-भाव साकार के प्रति ही सम्भव है, निराकार के प्रति नहीं। इसका कारण यह है कि निराकार ब्रह्म प्रेम का आश्रय नही हो सकता। प्रेम के लिए प्रतिपादन, प्रतिक्रिया आवश्यक है जो सगुण द्वारा ही सम्भव है, निर्गुण द्वारा नही। अतः साहित्य मे कई स्थानो पर अपा- र्थिव आलम्बन को सगुण निराकार-रूप मे चित्रित करके आत्मा का उसमे रति-भाव आरोपित किया है। सूफी कवियों की प्रेममयी तथा सन्त-कवियो की रहस्यमयी भक्ति ऐसी ही है। निर्गुण और निराकार के प्रति रति-भाव का प्रद-
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र्शन नही हो सकता, अतः निर्गुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की ज्ञानबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति में प्रेम को आनंदमग्नता की संज्ञा दी जाती है। ज्ञानमूलक होने के कारण इस प्रेम के क्षेत्र से बाहर की वस्तु माना जा सकता है, किन्तु तथ्य यह नही है । इस अपार्थिव सम्बन्ध मे भावना की मग्नता है, इसीलिए इसे प्रेम ही कहा जायेगा । उपनिषदो मे आत्मा के इसी आनंद की व्याख्या की गई है। रसखान का प्रेम-दर्शन रसखान ने अपार्थिव प्रेम का निरूपण किया है। इन्होंने स्पष्ट कहा है कि राधा और कृष्ण ये दोनो ही प्रेम के आलम्बन है, प्रेम वाटिका के मालिन और माली है। प्रेम-तत्त्व सुबोध और सर्वगम्य नही है । अतः इस तत्त्व को सभी मनुष्य नही जान सकते । पर विडम्बना यह है कि प्रेम के ज्ञाता होने का सभी दावा करते है। जो व्यक्ति प्रेम-तत्त्व को जान जाता है, वह ससार के सभी दुखों एवं क्लेशो से मुक्त हो जाता है। प्रेम अगम, अनुपम, अमित और सागर के समान गंभीर होता है, जो इस प्रेम-सागर के समीप आ जाता है वह फिर यहां से लौट कर वापिस नही जाता । प्रेम कमल-नाल से भी पतला होता है, तलवार की धार पर चलने की भाँति दुष्कर होता है। इसका मार्ग सीधा भी है और टेढा भी । इस प्रकार प्रेम-तत्त्व अनुपम और विलक्षण है। ज्ञान की शोभा भी प्रेम से ही है। कोई व्यक्ति चाहे जितना गुणवान बन जाय, पर यदि उसमे प्रेम-तत्त्व नही है तो उसका ज्ञान फीका और निस्सार है। वेद, पुराण, आगम, स्तुति सभी का सार प्रेम है। बिना प्रेम के हृदय मे भगवद्-भक्ति का अंकुर प्रस्फुटित नही होता। प्रेम के विना किसी भी प्रकार के आनन्द का अनुभव नही हो सकता । प्रेम ज्ञान, कर्म आदि सभी उपलब्धियो से श्रेष्ठ है, क्योकि ज्ञान, कर्म, उपासना ये सब अहंकार के कारण है। जब तक हृदय में प्रेमो- उत्पत्ति नही होती, तब तक किसी भी साधना अथवा कर्म के प्रति मनुष्य में दृढ निश्चय की भावना नही आती । जो प्रेम संसारिक आकर्षणो से उत्पन्न हुआ करता है, वह पार्थिव प्रेम है। इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता । सच्चे प्रेम मे, अपार्थिव प्रेम में, गुण, यौवन, रूप, धन स्वार्थ और कामना आदि कारण नही होते ; अर्थात् यह सबसे रहित मानस का सहज भाव होता है। प्रेम भगवान् की भाँति सर्व-
समीक्षा भाग ६५ व्यापक तत्त्व है। इसीलिए इस ससार मे अन्य सभी वस्तुओ को देखा जा सकता है, उनका वर्णन किया जा सकता है, पर प्रेम और भगवान् ये दो तत्त्व ऐसे है जिन्हे न तो देखा जा सकता है और न जिनका वर्णन किया जा सकता है। प्रेम ऐसा ज्ञान है जिसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् अन्य किसी ज्ञान को प्राप्त करने की आवश्यकता नही रह जाती। मित्र, स्त्री, वन्धु, पुत्र, आदि के प्रति मनुष्य के मन मे यद्यपि स्वाभाविक प्रेम होता है, पर इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता। सच्चा प्रेम किसी भी प्रकार के कारण की अपेक्षा नही रखता। वह सदैव समान रहता है और सदैव प्रिय की हित-कामनाओ से परिपूर्ण होता है। इस ससार मे अपने तन की ममता सर्वाधिक मानी जाती है, पर सच्चा प्रेम इससे भी अधिक प्यारा होता है। इस प्रेम को प्राप्त कर लेने के पश्चात् प्रभु- प्राप्ति की भी इच्छा नही रह जाती। ऐसा ही प्रेम अलौकिक शुद्ध, शुभ और सरस कहलाता है। इस प्रेम के अनेक नाम तथा रूप हैं। कोई इसे फाँसी कहता है कोई तलवार कहता है, कोई नेजा कहता है, कोई भाला कहता है, कोई बरछी कहता है, कोई तीर कहता है और कोई अनोखी रक्षा करनेवाली ढाल बताता है। इस प्रेम की मार इतनी सरस होती है कि जिसको यह मार पड जाये, वह इसके आनन्द मे सब कुछ भूल जाता है। इस प्रेम मे द्वैत भावना नही रहती, वरन् दोनो प्रेमी मिलकर एकाकार हो जाते हैं। जहाँ द्वैत-भावना बनी रहेगी, वहाँ सच्चे प्रेम का अभाव होगा। इसीलिए इस प्रेम को सब प्रकार की मुक्तियो से श्रेष्ठ माना गया है। प्रेम का अभाव नाश का कारण है। प्रेम से ही ससार की स्थिति हे। भगवान भी प्रेम के आधीन होते हैं। जो प्रेम आनन्दपूर्ण, स्वाभाविक, निस्वार्थ, अचल, महान् और एकरस होता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। शुद्ध प्रेम स्वय ही अंकुर है, स्वय ही बीज है, स्वय ही सिंचन है और स्वय ही डाल, पात, फल तथा फूल है। यही स्वय कारण और कार्य है, कर्त्ता, कर्म, क्रिया और करण भी यही स्वयं है। कहने का भाव यह है कि अलौकिक प्रेम की महत्ता, और उसका स्वरूप वैविध्यपूर्ण है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ईश्वर नाना रूपधारी एवं नामधारी है। रसखान का यह प्रेम-दर्शन भारतीय पद्धति पर आधृत है। निम्नलिपि
६६ रसखान-ग्रन्थावली
कतिपय तुलनात्मक उद्धरणो से यह मान्यता सिद्ध होती है— १. 'लोक वेद मरजाद सब, लाज काज संदेह । देत बहाये प्रेम करि, विधि-निषेध को नेह ॥' —रसखान 'सर्वमेव तदा सिद्धं, कर्त्तव्यं ना विशिष्यते ।' —बोधसार २ 'बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । शुद्ध कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥' —रसखान 'गुणरहित, कामनारहितं प्रतिक्षण वर्धमानमविच्छन्न सूक्ष्मतरमनुभव- रूपम् ।' —नारद-भक्तिसूत्र ३ 'जिहि पाए वैकुण्ठ अरु, हरिहू की नहि चाहि । सोइ अलौकिक शुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥' —रसखान 'यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साहो भवति ।' —नारद-भक्तिसूत्र ४. 'दो मन इक होते सुन्यो, पै वह प्रेम न आहि । होय जबहिं द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥' — रसखान 'प्रेमानन्दप्रकारेण द्वैत विस्मरण गतम् । —बोधसार ५. 'याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥' —रसखान 'सालोक्य साष्टि सामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' — भागवत
समीक्षा भाग ६७ ६. 'हरि के सब आधीन पै, हरी प्रेम आधीन । याही तें हरि आपु ही, याहि बड़प्पन दीन ॥' —रसखान 'अह भक्तपराधीनो ह्य स्वतन्त्र इव द्विज । साधुभिर्ग्र स्त हृदयो भत्तैर्भक्तजनप्रियः ॥' —भागवत अन्त मे, रसखान का प्रेम दर्शन भारतीय दर्शन पर आधृत है । भारतीय दर्शन मे प्रेम को जिस रूप मे वर्णित किया है, शुद्ध प्रेम का जो वैविध्य दिखाया है, वही रूप रसखान ने प्रेम-वाटिका मे प्रतिपादित किया है ।
: ५ : रसखान की भक्ति-पद्धति 'भक्ति' शब्द की उत्पत्ति 'भज्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है भजन । इसलिए भक्ति का अर्थ हुआ भगवान् का भजन अथवा स्मरण । मनुष्य आनन्द प्राप्त करने का अनादिकाल से ही इच्छुक रहा है और इसके लिए सदैव प्रयत्न- शील रहा है । इन्द्रियो के सहयोग से भी आनन्द प्राप्त होता है, पर इसे वास्तविक आनन्द नही कहा जा सकता, क्योकि यह सासारिक, क्षणिक और दुःख-पर्यवसायी है । इसी सत्य को गीता मे इन शब्दो मे प्रतिपादित किया गया है— 'ये हि संस्पर्शजाभोगा दुखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।।' इसीलिए बुद्धिमान लोग इन सासारिक सुखो की ओर आकर्षित नही होते । महर्षि पतंजलि ने भी विवेकी के लिए संसार के समस्त भोगो को दुःख का कारण बताया है— 'परिणामताप सस्कार दुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च सर्वमेवदुःख विवेकिन ।' सभी आचार्यों ने इस मत को एक स्वर से स्वीकार किया है कि वास्तविक आनन्द तो भगवत्सान्निध्य से ही प्राप्त हो सकता है । इसी सान्निध्य के सान्निध्य का प्रयास भक्ति है । इस सान्निध्य को प्राप्त करने के लिए दो मार्ग प्रमुख माने गये है—प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्तिमार्ग । प्रवृत्ति मार्ग का अर्थ है शरीर की स्वाभाविक प्रवृत्तियो द्वारा परमेश्वर को प्राप्त करना, अर्थात् विषयो को भगवदोन्मुख कर देना । इस मार्ग के दो भेद है—कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग । निवृत्ति मार्ग का अर्थ है प्रतिकूल वृत्तियो की निवृत्ति करके विवेक द्वारा अनात्म को त्यागते हुए भगवान् का साक्षात्कार । इस मार्ग के भी दो भेद है— योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । योगमार्ग का अर्थ है विषयो से चित्तवृत्तियो का निरोध करके ईश्वर मे सगमन करना, और ज्ञानमार्ग का अर्थ है आत्म-अनात्म का भेद
समीक्षा भाग ६६ करता । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भगवत्प्राप्ति के चार मार्ग है—कर्म- मार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । इन मार्गों मे भक्तिमार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, क्योकि यह सहज साध्य है— 'अन्यस्मात् सौलभ्य भक्तौ ।' आचार्यों द्वारा भक्ति की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी गई है । महर्षि नारद के अनुसार भक्ति परमप्रेमरूपा और अमृतस्वरूपा है जिसे प्राप्त करके मनुष्य सिद्ध, अमर तथा तृप्त हो जाता है— 'त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा अमृतरूपा च । यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति । भक्तराज शांडिल्य ने ईश्वर मे प्रगाढ अनुरक्ति को भक्ति कहा है— 'सापरानुरक्तिरीश्वरे ।' भागवतकार के अनुसार सासारिक विषयो का ज्ञान देने वाली इन्द्रियो की स्वाभाविक प्रवृत्ति निष्काम रूप से जब भगवदोन्मुख हो जाती है तो उसे भक्ति कहते है— 'देवाना गुणलिंगानामनुश्रविक कर्मणा सत्व एवैक मनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु याऽनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।' रूपगोस्वामी के मत से श्रीकृष्ण का अनुकूल रूप मे अनुशीलन जिसमे अन्य किसी प्रकार की अभिलाषा न हो और जिस पर ज्ञान, कर्म आदि का आवरण न हो, भक्ति कहलाता है— 'अन्याभिलाषिता शून्य ज्ञान कर्माद्यनावृतम् । आनुकूल्येन कृष्णानुशीलं भक्तिरुत्तमा ॥' वल्लभाचार्य के अनुसार भगवान के महात्म्य का ज्ञान रखते हुए उनमे सबसे अधिक दृढ स्नेह करना भक्ति है— 'महात्म्य ज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तयामुक्तिर्न चान्यथा ॥' इन सभी परिभाषाओ मे एक तत्त्व सर्वथा विद्यमान है । वह है ईश्वर के प्रति अनुराग । प्राय. सभी भक्त-सम्प्रदायो ने अनुराग को भक्ति का अनिवार्य अंग माना है । वल्लभीय सम्प्रदायी हरिराम अनुराग की महत्ता इन शब्दों मे प्रतिष्ठित करते हैं—
७० रसखान-ग्रन्थावली
'सो ठाकुर जी भक्त के स्नेहवश होय भक्त के पाछे-पाछे डोलते है । सो जहाँ ताईं ऐसो स्नेह नही होय तहाँ ताईं महात्म्य रखनो......तासो महात्म्य विचारै और अपराध सौं डरपै तो कृपा होय । जब सर्वोपरि स्नेह होयगो तब आपही ते स्नेह एसो पदार्थ जो महात्म्य कूँ छुडाय देयगो ।' भक्ति के अनेक भेद है । इसके विभाजन के मुख्यतया चार आधार माने जाते है— १. साधना का आधार । २. अधिकारी का आधार । ३ प्रेरणा का आधार । ४. विकास का आधार । साधना के आधार पर, भागवतकार ने भक्ति के नौ भेद किये है—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवा, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । अष्टछाप के प्रमुख कवि नन्ददास ने पहले छह भेदो को दो भागो के अन्तर्गत सपांदित किया है—नादमार्ग और रसमार्ग । पहले तीन प्रकार अर्थात् श्रवण, कीर्तन और स्मरण नादमार्ग के और पादसेवा, अर्चन तथा वन्दन रसमार्ग के अन्तर्गत आते है । अधिकारी के आधार पर भक्ति के चार भेद माने गये है—सात्विकी, राजसी, तामसी और निर्गुण । जो भक्त पापो के नाश के लिए अपने पाप-पुण्य सब भगवदर्पित कर देता है और अनन्य भाव से ईश्वर मे आसक्ति रखता है, उसकी भक्ति सात्विकी कहलाती है, राजसी भक्ति लौकिक विषय, यश, ऐश्वर्य आदि को दृष्टि मे रखकर की जाती है । तामसी भक्ति मे हिंसा, दम्भ, क्रोधादि के वशीभूत होकर इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवत-उपासना की जाती है । निर्गुण भक्ति में परमेश्वर को सब मे सम भाव से व्याप्त जानते हुए अपने समस्त कर्म परमेश्वर को अर्पित किये जाते है । इसमे निष्काम आसक्ति रहती है । प्रेरणा के आधार पर भक्ति के अनेक भेद हो सकते है, क्योकि प्रेरणाओ की कोई संख्या निर्धारित नही की जा सकती । गीता मे आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ये चार प्रकार के भक्त बताये गये है—
'चतुर्विधा भजन्ते मा जना सुकृतिनोर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।' इन्ही भक्तो के आधार पर भक्ति के भी चार भेद किये जा सकते है । आर्त भक्त की भक्ति तामसी, जिज्ञासु की सात्विकी, अर्थार्थी की राजसी और ज्ञानी की निर्गुण कहलाती है । रूपगोस्वामी ने, विकास के आधार पर भक्ति के तीन भेद माने है- साधनरूपा, भावरूपा और प्रेमरूपा । साधनरूपा भक्ति भक्त की प्रथम अवस्था की द्योतिका है। इसमे भक्त का परमेश्वर से पूर्ण राग तो नही होता, किन्तु अर्चना आदि कर्मों के द्वारा वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है । भाव- रूपा भक्ति उसका साध्य होती है। भावरूपा भक्ति के दो भेद है- वैधी और और रागानुग । जब परमेश्वर मे स्वतः राग नही होता, वरन् शास्त्रो के शासन से अर्जित किया जाता है तो उसे वैधी भक्ति कहते है । वैधी भक्ति मे शास्त्र-ज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान होता है । रागानुसार भक्ति मे अनुराग का प्राधान्य होता है । इसमे शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा नही होती, वरन् भावना का अतिरेक आवश्यक है । परमेश्वर की ह्लादिनी, संगिनी और संवित् नाम की जो तीन शक्तियाँ है इनमे से पहली का जीवो मे प्रेम-रूप से प्रकट होने वाला अंश शुद्ध तत्त्व कहलाता है । यही भाव है । इसी भाव की भक्ति को भावरूपा भक्ति कहते है । हृदय जब भाव मे अत्यन्त द्रवीभूत और प्रगाढ ममता से सयुक्त हो जाता है तो यही प्रगाढावस्था प्रेम कहलाती है । इस भाव की भक्ति को प्रेमरूपा भक्ति कहते है । साधनारूपा भक्ति से प्रेमरूपा भक्ति तक आने के लिए भक्त को भक्ति-विकास के अनेक सोपानो को पार करना पडता है । भक्ति के स्वरूप पर विहगम दृष्टिपात करने के पश्चात् अब उन कृष्ण- भक्ति के समुदायो का संक्षिप्त परिचय जान लेना आवश्यक है जिन्होने भक्ति- जगत् एव साहित्य को प्रचुरता से प्रभावित किया है । इन समुदायो मे से मुख्य सम्प्रदाय ये है-- १ वल्लभ सम्प्रदाय ! २. गौडीय सम्प्रदाय । ३. राधावल्लभीय सम्प्रदाय ।
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४. सखी-सम्प्रदाय । ५ निम्बार्क सम्प्रदाय । वल्लभ सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य है। वल्लभाचार्य ने प्रेम-लक्षणा भक्ति को महत्ता प्रदान की है और नवधा भक्ति का प्रतिपादन किया है। इस सम्प्रदाय मे कृष्ण-भक्ति को प्रधानता दी गई है और राधा को उनकी (भगवान् की) आल्हादिनी शक्ति अथवा रसशक्ति के रूप मे स्वीकार किया गया है। कृष्ण-भक्त साहित्य मे इस सम्प्रदाय को सर्वाधिक मान्यता मिली है और इसका प्रचार सबसे अधिक हुआ है। गौडीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक चैतन्य महाप्रभु है। इस सम्प्रदाय मे राधा और कृष्ण के समान महत्त्व को स्वीकार किया गया है और दोनो की समान पूजा का विधान माना गया है। इसमे सत्सग, नाम तथा लीला-कीर्तन, ब्रज-वृन्दावन, कृष्ण-मूर्ति की सेवा पूजा आदि भक्ति के साधनो को विशेष महत्त्व दिया गया है। राधाबल्लभीय सम्प्रदाय के प्रवर्तक स्वामी हितहरिवंश है। इस सम्प्रदाय मे राधा की पूजा को प्रधानता दी गई है, यद्यपि कृष्ण-पूजा की भी उपेक्षा नही है। इसमे राधा-कृष्ण की कुंजलीला तथा शृंगारकेलि को प्रधानता देने के कारण रति-क्रीडा का ही एक मात्र आलंबन ग्रहण किया गया है। इसमें विप्रलंभ शृंगार का अभाव तो है, किन्तु सूक्ष्म विरह की अनोखी सृष्टि की गई है। सखी सम्प्रदाय का दूसरा नाम हरिदासी सम्प्रदाय भी है, क्योकि हरिदास इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक है। इस सम्प्रदाय मे राधा-कृष्ण की युगल-उपासना का विधान सखी-भाव से किया गया है। निम्बार्क-सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य निम्बार्क है। वल्लभ और गौडीय सम्प्रदायो की भाँति इस सम्प्रदाय मे भी मधुर भाव की उत्कृष्टता स्वीकार की गई है। इस सम्प्रदाय मे कृष्ण को आराध्य माना गया है जो अपनी प्रेम और माधुर्य की अधिष्ठात्री शक्ति राधा तथा अन्य आह्लादिनी गोपी-स्वरूपा शक्तियो से घिरे रहते है। इस सम्प्रदाय मे कृष्णोपासना के साथ-साथ राधा की उपा- सना का भी विशेष महत्त्व माना गया है।
समीक्षा भाग ७३
रसखान की भक्ति-पद्धति
रसखान बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी है, अतः इनकी भक्ति-पद्धति वैष्णव- भक्ति है। वैष्णव भक्ति-पद्धति मे नवधा भक्ति को पूर्ण महत्त्व दिया गया है। नवधा भक्ति के नौ सोपान हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पद-सेवा, अर्चन, वन्दन दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। सूरदास ने इसमे मधुर भाव को जोडकर इसके दस सोपान बना दिये है। श्रवण मे भक्त अपने आराध्य के गुणो को सुनता है, कीर्तन के द्वारा उन्हे प्रकट करता है, । नाचकर तथा गाकर सुनाता है। पद- सेवा का अर्थ है भगवान के चरणों की पूजा करना अथवा उनके चरणो की महत्ता का वर्णन करना। अर्चन का अर्थ है पूजा करना, वन्दन का अर्थ है स्तुति करना। दास्य मे भक्त दास-भाव से अपने आराध्य की सेवा करता है अथवा उसका गुण-गान करता है और आत्मनिवेदन मे भक्त अपने भगवान के समक्ष अपना हृदय खोलकर रख देता है। रसखान के काव्य मे ये सभी सोपान प्राप्त नही होते। वस्तुत रसखान किसी बांधी हुई पद्धति पर चलनेवाले भक्त नही है। ये प्रेमोमंग के भक्त है, अत इनके काव्य मे माधुर्य भक्ति ही अधिक दिखाई पडती है।
माधुर्य भक्ति के तीन अंग प्रमुख है— रूप-वर्णन, विरह-वर्णन और पूर्णतया आत्मसमर्पण। रसखान-काव्य मे ये तीनो अंग पाये जाते है। रूप-वर्णन के कुछ उदाहरण देखिए —
१. 'मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी। अंग ही अंग जराव लसै ग्रह सीस लसै पगिया जरतारी। पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी। चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झांके झरोखे मैं बाँकेबिहारी ॥'
२. 'गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल, आगे गैयाँ पाछै ग्वाल गावै मृदु तानि री। तैसी धुनि बांसुरी की मधुर मधुर जैसी, बक चितवनि मद मंद मुसकानि री।
७४ रसखान-ग्रन्थावली कदंब विटप के निकट तटनी के तट, अटा चढ़ि चाहि पीत-पट फहरानि री । रस वरसावै तन तपनि बुझावै नैन, आननि रिझावै वह आवै रसखानि री । ३ 'नैननि बक बिसाल के वाननि झेलि सकै अस कौन नवेली । लोलत है हिय तीछन कोर मुमार गिरी तिय कोटिक हेली । छोडै नहीं छिनहूं रसखानि सु लागी फिरै द्रुम मों जनु वेली । रौरि परि छवि की ब्रजमडल कुंडल गंड'न कुंतल केली ॥' ४ 'बांकी बडी अँखियाँ वडरारे कपोल'न बोलनि की कल वानी । सुन्दर हास सुधानिधि सो मुख मूरति रंग सुधारस-सानी । ऐसी नवेली ने देखे कहूँ ब्रजराज लला अति ही सुखदानी । डोलति है बन वीथिन में रसखानि मनोहर रूप लुभानी ॥' ५. 'लाल लसै पगिया सब के पट कोटि सुगंधनि भीने । अंगनि अंग सजे सब ही रसखानि अनेक जराउ नवीने । मुकता गल माल लसै सबके सब ग्वार कुमार सिंगार सो कीने । पै सिगरे ब्रज वेहरि ही हरि ही के हरै हियरा हरि लीने ॥' ६ 'साँझ समै जिहि देखती ही तिहि पेखन का कौ मन यों 'ललकै री । ऊँची अटान चढ़ी ब्रजबाल सु लाज मनेह दुरै उझकै री । गोधन धूरि की धूँधरी मैं तिनकी छवि यों रसखानि तकै री । पावक के गिरि ते बुझि मानो धुँवा-लपटी लपटै लपकै री ॥' जिस प्रकार रसखान ने कृष्ण के रूप का, सौन्दर्य का वर्णन किया है, उसी प्रकार राधा के सौन्दर्य का भी विस्तार से वर्णन किया है । कुछ उदाहरण प्रस्तुत है— १. 'प्यारी की चाह सिंगार तरंगनि जाय लगी रति की दुति कूलनि । जोबन जेब कहा कहिये उर पै छवि मजु अनेक दुकूलनि ।