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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ७३

रसखान की भक्ति-पद्धति

रसखान बल्लभ सम्प्रदाय के अनुयायी है, अतः इनकी भक्ति-पद्धति वैष्णव- भक्ति है। वैष्णव भक्ति-पद्धति मे नवधा भक्ति को पूर्ण महत्त्व दिया गया है। नवधा भक्ति के नौ सोपान हैं—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पद-सेवा, अर्चन, वन्दन दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन। सूरदास ने इसमे मधुर भाव को जोडकर इसके दस सोपान बना दिये है। श्रवण मे भक्त अपने आराध्य के गुणो को सुनता है, कीर्तन के द्वारा उन्हे प्रकट करता है, । नाचकर तथा गाकर सुनाता है। पद- सेवा का अर्थ है भगवान के चरणों की पूजा करना अथवा उनके चरणो की महत्ता का वर्णन करना। अर्चन का अर्थ है पूजा करना, वन्दन का अर्थ है स्तुति करना। दास्य मे भक्त दास-भाव से अपने आराध्य की सेवा करता है अथवा उसका गुण-गान करता है और आत्मनिवेदन मे भक्त अपने भगवान के समक्ष अपना हृदय खोलकर रख देता है। रसखान के काव्य मे ये सभी सोपान प्राप्त नही होते। वस्तुत रसखान किसी बांधी हुई पद्धति पर चलनेवाले भक्त नही है। ये प्रेमोमंग के भक्त है, अत इनके काव्य मे माधुर्य भक्ति ही अधिक दिखाई पडती है।

माधुर्य भक्ति के तीन अंग प्रमुख है— रूप-वर्णन, विरह-वर्णन और पूर्णतया आत्मसमर्पण। रसखान-काव्य मे ये तीनो अंग पाये जाते है। रूप-वर्णन के कुछ उदाहरण देखिए —

१. 'मोतिन माल बनी नट के, लटकी लटवा लट घूँघरवारी। अंग ही अंग जराव लसै ग्रह सीस लसै पगिया जरतारी। पूरब पुन्यनि तें रसखानि सु मोहिनी मूरति आनि निहारी। चार्यो दिसानि की लै छवि आनि कै झांके झरोखे मैं बाँकेबिहारी ॥'

२. 'गोरज विराजै भाल लहलही बनमाल, आगे गैयाँ पाछै ग्वाल गावै मृदु तानि री। तैसी धुनि बांसुरी की मधुर मधुर जैसी, बक चितवनि मद मंद मुसकानि री।