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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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६४ रसखान-ग्रन्थावली

र्शन नही हो सकता, अतः निर्गुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की ज्ञानबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति में प्रेम को आनंदमग्नता की संज्ञा दी जाती है। ज्ञानमूलक होने के कारण इस प्रेम के क्षेत्र से बाहर की वस्तु माना जा सकता है, किन्तु तथ्य यह नही है । इस अपार्थिव सम्बन्ध मे भावना की मग्नता है, इसीलिए इसे प्रेम ही कहा जायेगा । उपनिषदो मे आत्मा के इसी आनंद की व्याख्या की गई है। रसखान का प्रेम-दर्शन रसखान ने अपार्थिव प्रेम का निरूपण किया है। इन्होंने स्पष्ट कहा है कि राधा और कृष्ण ये दोनो ही प्रेम के आलम्बन है, प्रेम वाटिका के मालिन और माली है। प्रेम-तत्त्व सुबोध और सर्वगम्य नही है । अतः इस तत्त्व को सभी मनुष्य नही जान सकते । पर विडम्बना यह है कि प्रेम के ज्ञाता होने का सभी दावा करते है। जो व्यक्ति प्रेम-तत्त्व को जान जाता है, वह ससार के सभी दुखों एवं क्लेशो से मुक्त हो जाता है। प्रेम अगम, अनुपम, अमित और सागर के समान गंभीर होता है, जो इस प्रेम-सागर के समीप आ जाता है वह फिर यहां से लौट कर वापिस नही जाता । प्रेम कमल-नाल से भी पतला होता है, तलवार की धार पर चलने की भाँति दुष्कर होता है। इसका मार्ग सीधा भी है और टेढा भी । इस प्रकार प्रेम-तत्त्व अनुपम और विलक्षण है। ज्ञान की शोभा भी प्रेम से ही है। कोई व्यक्ति चाहे जितना गुणवान बन जाय, पर यदि उसमे प्रेम-तत्त्व नही है तो उसका ज्ञान फीका और निस्सार है। वेद, पुराण, आगम, स्तुति सभी का सार प्रेम है। बिना प्रेम के हृदय मे भगवद्-भक्ति का अंकुर प्रस्फुटित नही होता। प्रेम के विना किसी भी प्रकार के आनन्द का अनुभव नही हो सकता । प्रेम ज्ञान, कर्म आदि सभी उपलब्धियो से श्रेष्ठ है, क्योकि ज्ञान, कर्म, उपासना ये सब अहंकार के कारण है। जब तक हृदय में प्रेमो- उत्पत्ति नही होती, तब तक किसी भी साधना अथवा कर्म के प्रति मनुष्य में दृढ निश्चय की भावना नही आती । जो प्रेम संसारिक आकर्षणो से उत्पन्न हुआ करता है, वह पार्थिव प्रेम है। इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता । सच्चे प्रेम मे, अपार्थिव प्रेम में, गुण, यौवन, रूप, धन स्वार्थ और कामना आदि कारण नही होते ; अर्थात् यह सबसे रहित मानस का सहज भाव होता है। प्रेम भगवान् की भाँति सर्व-