रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ६५ व्यापक तत्त्व है। इसीलिए इस ससार मे अन्य सभी वस्तुओ को देखा जा सकता है, उनका वर्णन किया जा सकता है, पर प्रेम और भगवान् ये दो तत्त्व ऐसे है जिन्हे न तो देखा जा सकता है और न जिनका वर्णन किया जा सकता है। प्रेम ऐसा ज्ञान है जिसे प्राप्त कर लेने के पश्चात् अन्य किसी ज्ञान को प्राप्त करने की आवश्यकता नही रह जाती। मित्र, स्त्री, वन्धु, पुत्र, आदि के प्रति मनुष्य के मन मे यद्यपि स्वाभाविक प्रेम होता है, पर इसे सच्चा प्रेम नही कहा जा सकता। सच्चा प्रेम किसी भी प्रकार के कारण की अपेक्षा नही रखता। वह सदैव समान रहता है और सदैव प्रिय की हित-कामनाओ से परिपूर्ण होता है। इस ससार मे अपने तन की ममता सर्वाधिक मानी जाती है, पर सच्चा प्रेम इससे भी अधिक प्यारा होता है। इस प्रेम को प्राप्त कर लेने के पश्चात् प्रभु- प्राप्ति की भी इच्छा नही रह जाती। ऐसा ही प्रेम अलौकिक शुद्ध, शुभ और सरस कहलाता है। इस प्रेम के अनेक नाम तथा रूप हैं। कोई इसे फाँसी कहता है कोई तलवार कहता है, कोई नेजा कहता है, कोई भाला कहता है, कोई बरछी कहता है, कोई तीर कहता है और कोई अनोखी रक्षा करनेवाली ढाल बताता है। इस प्रेम की मार इतनी सरस होती है कि जिसको यह मार पड जाये, वह इसके आनन्द मे सब कुछ भूल जाता है। इस प्रेम मे द्वैत भावना नही रहती, वरन् दोनो प्रेमी मिलकर एकाकार हो जाते हैं। जहाँ द्वैत-भावना बनी रहेगी, वहाँ सच्चे प्रेम का अभाव होगा। इसीलिए इस प्रेम को सब प्रकार की मुक्तियो से श्रेष्ठ माना गया है। प्रेम का अभाव नाश का कारण है। प्रेम से ही ससार की स्थिति हे। भगवान भी प्रेम के आधीन होते हैं। जो प्रेम आनन्दपूर्ण, स्वाभाविक, निस्वार्थ, अचल, महान् और एकरस होता है, वही शुद्ध प्रेम कहलाता है। शुद्ध प्रेम स्वय ही अंकुर है, स्वय ही बीज है, स्वय ही सिंचन है और स्वय ही डाल, पात, फल तथा फूल है। यही स्वय कारण और कार्य है, कर्त्ता, कर्म, क्रिया और करण भी यही स्वयं है। कहने का भाव यह है कि अलौकिक प्रेम की महत्ता, और उसका स्वरूप वैविध्यपूर्ण है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ईश्वर नाना रूपधारी एवं नामधारी है। रसखान का यह प्रेम-दर्शन भारतीय पद्धति पर आधृत है। निम्नलिपि