भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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६६ रसखान-ग्रन्थावली

कतिपय तुलनात्मक उद्धरणो से यह मान्यता सिद्ध होती है— १. 'लोक वेद मरजाद सब, लाज काज संदेह । देत बहाये प्रेम करि, विधि-निषेध को नेह ॥' —रसखान 'सर्वमेव तदा सिद्धं, कर्त्तव्यं ना विशिष्यते ।' —बोधसार २ 'बिन गुन जोबन रूप धन, बिन स्वारथ हित जानि । शुद्ध कामना तें रहित, प्रेम सकल रसखानि ॥' —रसखान 'गुणरहित, कामनारहितं प्रतिक्षण वर्धमानमविच्छन्न सूक्ष्मतरमनुभव- रूपम् ।' —नारद-भक्तिसूत्र ३ 'जिहि पाए वैकुण्ठ अरु, हरिहू की नहि चाहि । सोइ अलौकिक शुद्ध सुभ, सरस सुप्रेम कहाहि ॥' —रसखान 'यत्प्राप्य न किञ्चिद्वाञ्छति, शोचति, न द्वेष्टि, न रमते, नोत्साहो भवति ।' —नारद-भक्तिसूत्र ४. 'दो मन इक होते सुन्यो, पै वह प्रेम न आहि । होय जबहिं द्वै तनहुँ इक, सोई प्रेम कहाहि ॥' — रसखान 'प्रेमानन्दप्रकारेण द्वैत विस्मरण गतम् । —बोधसार ५. 'याही तें सब मुक्ति ते, लही बडाई प्रेम । प्रेम भए नसि जाहि सब, बँधे जगत के नेम ॥' —रसखान 'सालोक्य साष्टि सामीप्य सारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥' — भागवत