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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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समीक्षा भाग ६३ सहज ऐन्द्रिय सुख से ऊपर का प्रेम ही आत्मा की प्रीति है। ऐसे प्रेम मे वस्तुतः वासना का परिष्कार एवं उन्नयन हो जाता है और वह वासना त्याग तथा सयम का प्रतिरूप बन जाती है। जिस प्रेम का आलम्बन अपार्थिव हो, उसे अपार्थिव प्रेम कहते हैं। अपा- र्थिव प्रेम को चार भागो मे विभक्त किया जा सकता है— १ अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति । २. सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति । ३. सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना । ४. निर्गुण निराकार के प्रति मानव आत्मा की ज्ञानमूलक आनंदबद्ध प्रणयाभिव्यक्ति । अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की वासनामूलक प्रणया- भिव्यक्ति सगुण साकार के प्रति ही सम्भव है। अतः सगुण और साकार अपा- र्थिव आलम्बन आश्रय की भावना के लिए नितांत आवश्यक है। पार्वती-शिव, राधा-कृष्ण, सीता-राम का शक्ति और परम पुरुष के रूप मे वर्णन अपार्थिव प्रणयमूलक प्रेम है। सगुण साकार अपार्थिव आलम्बन के प्रति अपार्थिव आश्रय की दाम्पत्य प्रणयाभिव्यक्ति मे पार्थिव आश्रय सगुण और साकार अपार्थिव आश्रय मे वासना का आरोप कर लेता है। फलत. ऐसे प्रेम मे ऐन्द्रिय भावना का समावेश हो जाता है, किन्तु आलम्बन की अपार्थिवता के कारण ऐन्द्रिय भावना उदात्त रूप मे ही व्यक्त होती है। सगुण निराकार के प्रति मानव-आत्मा की रीति-भावना मे पार्थिव आश्रय का रति-भाव साकार के प्रति ही सम्भव है, निराकार के प्रति नहीं। इसका कारण यह है कि निराकार ब्रह्म प्रेम का आश्रय नही हो सकता। प्रेम के लिए प्रतिपादन, प्रतिक्रिया आवश्यक है जो सगुण द्वारा ही सम्भव है, निर्गुण द्वारा नही। अतः साहित्य मे कई स्थानो पर अपा- र्थिव आलम्बन को सगुण निराकार-रूप मे चित्रित करके आत्मा का उसमे रति-भाव आरोपित किया है। सूफी कवियों की प्रेममयी तथा सन्त-कवियो की रहस्यमयी भक्ति ऐसी ही है। निर्गुण और निराकार के प्रति रति-भाव का प्रद-