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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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८. उन्माद —उन्माद का अर्थ है पागलपन । प्रेमी में जब अपने प्रिय के प्रति इतना ममत्व आ जाता है कि वह उसके बिना पागल-सा बन जाता है तो उसकी यह दशा उन्माद कहलाती है । उन्माद गुण के उदय होने पर महाभाव की दशा आती है । इस दशा मे सयोग के कल्प निमेष की भाँति और वियोग के निमेष कल्प की भाँति प्रतीत होते हैं । प्रेम के गुणों पर दृष्टिपात करने के उपरात अब यह जान लेना आवश्यक है कि प्रेम के कितने भेद होते हैं । इस वर्गीकरण के तीन आधार हो सकते हैं— १. प्रेम की मात्रा का आधार । २. प्रेम के आलम्बन का आधार । ३. प्रेम के स्वरूप का आधार । प्रेम की मात्रा के आधार पर प्रेम के तीन भेद हैं—उत्तम, मध्यम और अधम । प्रेम के आलम्बन के आधार पर प्रेम के अपार भेद हो सकते हैं । यथा—देश-प्रेम, जाति-प्रेम, मानव-प्रेम, पशु-प्रेम, पक्षी-प्रेम, पुस्तक-प्रेम, दुग्ध-प्रेम, आदि । प्रेम के स्वरूप के आधार पर प्रेम के दो भेद है—पार्थिव प्रेम और अपार्थिव प्रेम । पार्थिव प्रेम के भी दो भेद होते हैं—प्राकृत प्रेम और सात्विक प्रेम । इन्हे पाश्चात्य आचार्यों ने क्रमशः 'नैच्यूरल लव' (Natural Love) और 'प्लेटोनिक लव (Platonic Love) कहा है । सहज मानव-प्रेम ही को प्रकृत प्रेम कहा जाता है । पार्थिव आलम्बन के प्रति पार्थिव आश्रय की सहज वासनात्मक प्रणयाभिव्यक्तियाँ इसी प्रेम के अन्तर्गत आती हैं । दूसरे शब्दो मे कह सकते हैं कि नर-नारी की सहज प्रीति ही प्रकृत प्रेम है । ऐसे प्रेम का आलम्बन पार्थिव होता है, अत शरीर-सुख की उत्कट इच्छा से प्रेरित होकर जिस प्रेम का निवेदन किया जाता है, वह स्व- भावत ही वासनात्मक होता है। रीतिकालौन काव्य मे ऐसे ही वासनात्मक प्रेम की अभिव्यक्ति है । सात्विक प्रेम इस प्रेम से भिन्न होता है । प्लेटो ने आत्मा की प्रीति का वर्णन किया है । उसने पार्थिव आलम्बन के प्रति अशरीरी अकांक्षा अथवा वासनायुक्त शुद्ध प्रीति और शुद्ध राग को ही सात्विक प्रेम की संज्ञा दी है ।