भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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५७ समीक्षा भाग

'स्वतंत्र भारत' ५ मार्च सन् १६२८ के होली विशेषांक मे श्री पूत्तूलाल शर्मा ने यह सवैया रसखान के नाम से उद्धृत किया है । शर्मा जी को यह सवैया कहाँ से मिला, इसकी ओर कोई संकेत नहीं किया गया है । नवीन कवि इसे रसखान- कृत न मानकर किसी अन्य अज्ञात कवि द्वारा रचित मानते हैं । इस सवैये के अंश 'भावै सुमोहि करो रसखान' के स्थान पर 'भावै तुम्हे सु करो मुहि लालन' पाठ भी मिलता है । नवीन ने वसंत ऋतु के अन्तर्गत फाग-प्रसंग मे इस सवैये को उद्धृत किया है । छठा छंद है — 'नन्द महर के बगर तनु, अब मेरे को जाय । नाहक कहुँ गढि जायगो, हित काँटो मन पाय ॥' यह दोहा रसनिधि-कृत 'रतन हजारा' का है । हिन्दी शब्द-सागरकार ने भूल से इसे रसखान का मान लिया है । सातवाँ छंद है— 'सुरतर लतनि चार फल है ललित कैधौं, कामधेनु धारा सम नेह उपजावनी । कैधौं चिन्तामनिन की माल उर सोभित, बिसाल कठ मे धरे है जोति झलकावनी । प्रभु की कहानी ते गुसाई की मधुर बानी, मुक्ति सुखदानी रसखानि मन भावनी । खाँड की खिजावनी सी कंद की कुढावनी सी, सिता को सतावनी सी सुधा सकुचावनी ॥' (वर्ष ५, खंड १, श्रावण १६८७ वि० मे) 'कल्याण' मासिक पत्रिका मे यह कवित्त प्रकाशित किया गया था । इसे रसखान-कृत मान लेने का भ्रम सम्भवतः 'मुक्ति सुखदानी रसखानि मनभावनी' के कारण हुआ है । इसे रसखान-कृत मान लेने का अभी तक कोई दृढ प्रमाण उपलब्ध नही हुआ है ।