भारतकोश
रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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५८ रसखान-ग्रन्थावली आठवाँ पद है - 'अंग भभूत लगाये महा सुख है कोउ ऐसो सो प्रेमहु पागै । नाथ को नाम सुनै विगसै हियो कान्ह को नाम सुनै अनुरागे । जोग लिए हरि प्यारो मिलै तो पै कान कटाये कहा दुख लागै । मोहन के मन मानी यही तो सबै री कहौ मिलि गोरख जागै ॥' यह सवैया किसका रचा हुआ है, यह बताना असम्भव है । नवीन ने इसे किसी नाथ कवि का माना है । यह भ्रम नाथ शब्द के कारण हुआ है । यह शब्द नाथपंथियो के लिए प्रयुक्त हुआ है । नवाँ पद है- 'कैसा है यह देश निगोरा । जग होरी ब्रज होरा । मै जल जमुना भरन जात रही, देखि बदन मेरा गोरा । मोसो कहै चलो कुजन मे, तनक-तनक से छोरा । परे आँखिन मे डोरा ॥ जियरा देखि डरात सखी री, लाज भरम को ओरा । का बूढे का लोग लुगाई, एक ते एक ठिठोरा । न काहू सो काहू को जोरा । मन मेरो हर्यो नन्द के ने सखि, चलत लगावत चोरा । कहै रसखान सिखाइ सखन सो, सब मेरा अंग टटोरा । न मानत करत निहोरा ॥' इस पद को श्री अखिलेश मिश्र ने १८ सितम्बर १६६० के 'स्वतत्र भारत' मे रसखान का मानकर उद्धृत किया है । इस भ्रम का कारण 'कहै रसखान' वाक्यांश है । यहाँ रसखान का अर्थ कृष्ण है । दसवाँ पद है- 'परम चतुर पुनि रसिक वर, कैसो हू नर होय । बिना प्रेम रूखो लगै, बादि चतुरई सोय ॥' गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित 'प्रेमयोग' नामक पुस्तक मे यह दोहा रसखान के नाम से दिया गया है । अन्यथा कोई प्रमाण उपलब्ध नही होता ।