रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें: ५ : रसखान की भक्ति-पद्धति 'भक्ति' शब्द की उत्पत्ति 'भज्' धातु से हुई है जिसका अर्थ है भजन । इसलिए भक्ति का अर्थ हुआ भगवान् का भजन अथवा स्मरण । मनुष्य आनन्द प्राप्त करने का अनादिकाल से ही इच्छुक रहा है और इसके लिए सदैव प्रयत्न- शील रहा है । इन्द्रियो के सहयोग से भी आनन्द प्राप्त होता है, पर इसे वास्तविक आनन्द नही कहा जा सकता, क्योकि यह सासारिक, क्षणिक और दुःख-पर्यवसायी है । इसी सत्य को गीता मे इन शब्दो मे प्रतिपादित किया गया है— 'ये हि संस्पर्शजाभोगा दुखयोनय एव ते । आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ।।' इसीलिए बुद्धिमान लोग इन सासारिक सुखो की ओर आकर्षित नही होते । महर्षि पतंजलि ने भी विवेकी के लिए संसार के समस्त भोगो को दुःख का कारण बताया है— 'परिणामताप सस्कार दुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च सर्वमेवदुःख विवेकिन ।' सभी आचार्यों ने इस मत को एक स्वर से स्वीकार किया है कि वास्तविक आनन्द तो भगवत्सान्निध्य से ही प्राप्त हो सकता है । इसी सान्निध्य के सान्निध्य का प्रयास भक्ति है । इस सान्निध्य को प्राप्त करने के लिए दो मार्ग प्रमुख माने गये है—प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्तिमार्ग । प्रवृत्ति मार्ग का अर्थ है शरीर की स्वाभाविक प्रवृत्तियो द्वारा परमेश्वर को प्राप्त करना, अर्थात् विषयो को भगवदोन्मुख कर देना । इस मार्ग के दो भेद है—कर्ममार्ग और भक्तिमार्ग । निवृत्ति मार्ग का अर्थ है प्रतिकूल वृत्तियो की निवृत्ति करके विवेक द्वारा अनात्म को त्यागते हुए भगवान् का साक्षात्कार । इस मार्ग के भी दो भेद है— योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । योगमार्ग का अर्थ है विषयो से चित्तवृत्तियो का निरोध करके ईश्वर मे सगमन करना, और ज्ञानमार्ग का अर्थ है आत्म-अनात्म का भेद