रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमीक्षा भाग ६६ करता । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भगवत्प्राप्ति के चार मार्ग है—कर्म- मार्ग, भक्तिमार्ग, योगमार्ग और ज्ञानमार्ग । इन मार्गों मे भक्तिमार्ग को ही सर्वश्रेष्ठ बताया गया है, क्योकि यह सहज साध्य है— 'अन्यस्मात् सौलभ्य भक्तौ ।' आचार्यों द्वारा भक्ति की भिन्न-भिन्न परिभाषाएँ दी गई है । महर्षि नारद के अनुसार भक्ति परमप्रेमरूपा और अमृतस्वरूपा है जिसे प्राप्त करके मनुष्य सिद्ध, अमर तथा तृप्त हो जाता है— 'त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा अमृतरूपा च । यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति, अमृतो भवति, तृप्तो भवति । भक्तराज शांडिल्य ने ईश्वर मे प्रगाढ अनुरक्ति को भक्ति कहा है— 'सापरानुरक्तिरीश्वरे ।' भागवतकार के अनुसार सासारिक विषयो का ज्ञान देने वाली इन्द्रियो की स्वाभाविक प्रवृत्ति निष्काम रूप से जब भगवदोन्मुख हो जाती है तो उसे भक्ति कहते है— 'देवाना गुणलिंगानामनुश्रविक कर्मणा सत्व एवैक मनसो वृत्तिः स्वाभाविकी तु याऽनिमित्ता भागवती भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।' रूपगोस्वामी के मत से श्रीकृष्ण का अनुकूल रूप मे अनुशीलन जिसमे अन्य किसी प्रकार की अभिलाषा न हो और जिस पर ज्ञान, कर्म आदि का आवरण न हो, भक्ति कहलाता है— 'अन्याभिलाषिता शून्य ज्ञान कर्माद्यनावृतम् । आनुकूल्येन कृष्णानुशीलं भक्तिरुत्तमा ॥' वल्लभाचार्य के अनुसार भगवान के महात्म्य का ज्ञान रखते हुए उनमे सबसे अधिक दृढ स्नेह करना भक्ति है— 'महात्म्य ज्ञानपूर्वस्तु सुदृढः सर्वतोऽधिकः । स्नेहो भक्तिरिति प्रोक्तस्तयामुक्तिर्न चान्यथा ॥' इन सभी परिभाषाओ मे एक तत्त्व सर्वथा विद्यमान है । वह है ईश्वर के प्रति अनुराग । प्राय. सभी भक्त-सम्प्रदायो ने अनुराग को भक्ति का अनिवार्य अंग माना है । वल्लभीय सम्प्रदायी हरिराम अनुराग की महत्ता इन शब्दों मे प्रतिष्ठित करते हैं—