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रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)

Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary

रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा

DevanagariBrajpublished368 पृष्ठ

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७० रसखान-ग्रन्थावली

'सो ठाकुर जी भक्त के स्नेहवश होय भक्त के पाछे-पाछे डोलते है । सो जहाँ ताईं ऐसो स्नेह नही होय तहाँ ताईं महात्म्य रखनो......तासो महात्म्य विचारै और अपराध सौं डरपै तो कृपा होय । जब सर्वोपरि स्नेह होयगो तब आपही ते स्नेह एसो पदार्थ जो महात्म्य कूँ छुडाय देयगो ।' भक्ति के अनेक भेद है । इसके विभाजन के मुख्यतया चार आधार माने जाते है— १. साधना का आधार । २. अधिकारी का आधार । ३ प्रेरणा का आधार । ४. विकास का आधार । साधना के आधार पर, भागवतकार ने भक्ति के नौ भेद किये है—श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवा, अर्चन, वन्दन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन । अष्टछाप के प्रमुख कवि नन्ददास ने पहले छह भेदो को दो भागो के अन्तर्गत सपांदित किया है—नादमार्ग और रसमार्ग । पहले तीन प्रकार अर्थात् श्रवण, कीर्तन और स्मरण नादमार्ग के और पादसेवा, अर्चन तथा वन्दन रसमार्ग के अन्तर्गत आते है । अधिकारी के आधार पर भक्ति के चार भेद माने गये है—सात्विकी, राजसी, तामसी और निर्गुण । जो भक्त पापो के नाश के लिए अपने पाप-पुण्य सब भगवदर्पित कर देता है और अनन्य भाव से ईश्वर मे आसक्ति रखता है, उसकी भक्ति सात्विकी कहलाती है, राजसी भक्ति लौकिक विषय, यश, ऐश्वर्य आदि को दृष्टि मे रखकर की जाती है । तामसी भक्ति मे हिंसा, दम्भ, क्रोधादि के वशीभूत होकर इच्छाओ की पूर्ति के लिए भगवत-उपासना की जाती है । निर्गुण भक्ति में परमेश्वर को सब मे सम भाव से व्याप्त जानते हुए अपने समस्त कर्म परमेश्वर को अर्पित किये जाते है । इसमे निष्काम आसक्ति रहती है । प्रेरणा के आधार पर भक्ति के अनेक भेद हो सकते है, क्योकि प्रेरणाओ की कोई संख्या निर्धारित नही की जा सकती । गीता मे आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ये चार प्रकार के भक्त बताये गये है—