रसखान रचनावली (सुजान रसखान, प्रेमवाटिका एवं दानलीला सटीक)
Raskhan Rachanavali with Hindi Commentary
रसखान (सैयद इब्राहिम) / पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'चतुर्विधा भजन्ते मा जना सुकृतिनोर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ।' इन्ही भक्तो के आधार पर भक्ति के भी चार भेद किये जा सकते है । आर्त भक्त की भक्ति तामसी, जिज्ञासु की सात्विकी, अर्थार्थी की राजसी और ज्ञानी की निर्गुण कहलाती है । रूपगोस्वामी ने, विकास के आधार पर भक्ति के तीन भेद माने है- साधनरूपा, भावरूपा और प्रेमरूपा । साधनरूपा भक्ति भक्त की प्रथम अवस्था की द्योतिका है। इसमे भक्त का परमेश्वर से पूर्ण राग तो नही होता, किन्तु अर्चना आदि कर्मों के द्वारा वह उसे प्राप्त करने का प्रयास करता है । भाव- रूपा भक्ति उसका साध्य होती है। भावरूपा भक्ति के दो भेद है- वैधी और और रागानुग । जब परमेश्वर मे स्वतः राग नही होता, वरन् शास्त्रो के शासन से अर्जित किया जाता है तो उसे वैधी भक्ति कहते है । वैधी भक्ति मे शास्त्र-ज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान होता है । रागानुसार भक्ति मे अनुराग का प्राधान्य होता है । इसमे शास्त्रीय ज्ञान की अपेक्षा नही होती, वरन् भावना का अतिरेक आवश्यक है । परमेश्वर की ह्लादिनी, संगिनी और संवित् नाम की जो तीन शक्तियाँ है इनमे से पहली का जीवो मे प्रेम-रूप से प्रकट होने वाला अंश शुद्ध तत्त्व कहलाता है । यही भाव है । इसी भाव की भक्ति को भावरूपा भक्ति कहते है । हृदय जब भाव मे अत्यन्त द्रवीभूत और प्रगाढ ममता से सयुक्त हो जाता है तो यही प्रगाढावस्था प्रेम कहलाती है । इस भाव की भक्ति को प्रेमरूपा भक्ति कहते है । साधनारूपा भक्ति से प्रेमरूपा भक्ति तक आने के लिए भक्त को भक्ति-विकास के अनेक सोपानो को पार करना पडता है । भक्ति के स्वरूप पर विहगम दृष्टिपात करने के पश्चात् अब उन कृष्ण- भक्ति के समुदायो का संक्षिप्त परिचय जान लेना आवश्यक है जिन्होने भक्ति- जगत् एव साहित्य को प्रचुरता से प्रभावित किया है । इन समुदायो मे से मुख्य सम्प्रदाय ये है-- १ वल्लभ सम्प्रदाय ! २. गौडीय सम्प्रदाय । ३. राधावल्लभीय सम्प्रदाय ।