भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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232 रत्नावलो her wonder much more. Thus my beloved remains often perturbed with fear lodged in her heart. 4. I have sent Vasantaka to obtain particulars about her ; but why is he delaying (so long) ? ( ततः प्रविशति हृष्टो वसन्तकः ) विदूषकः—( सपरितोषम् ) हो ही भो ! अच्छरिअं अच्छ- रिअं ! कोसंबोरज्जलाहेणवि ण तादिसो पिअवअस्सस्स हि- अयपरितोसो ¹जादिसो मम सआसादो अज्ज पिअवअणं सुणिअ हुविस्सदित्ति तक्केमि । ता जाव गदूण पिअवअस्सस्स णिवेद- इस्सं । ( परिक्रम्यावलोक्य च ) कधं एसो पिअवअस्सो जधा इमं ज्जेव्व दिसं अवलोअन्तो चिट्ठदि तहा तक्केमि मं ज्जेव्व पडिवालेदि । ता जाव णं उवसप्पामि । ( इत्युपसृत्य ) जयदु जयदु पिअवअस्सो ! भो वअस्स ! दिट्ठिआ