रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)
Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished520 पृष्ठ
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246 · रत्नावली वासवदत्ता—तदो तहिं ज्जेव्व गच्छह्म । (क) काञ्चनमाला—एदु एदु, भद्दिणी ! (ख) ( इति परिक्रामतः ) ( ततः प्रविशत्युपविष्टः कृतावगुण्ठनो वसन्तकः ) विदूषकः—( कर्णं दत्त्वा ) जह अंअं' चित्तसालिआदुवारे पद- सद्दो सुणीअदि तह तक्केमि आअदा साअरिआत्ति । (ग) काञ्चनमाला—भट्टिणि ! इअं सा चित्तसालिआ । ता जाब बसंतअस्स सञ्ञं करोमि¹ । (घ) ( इति छोटिकां ददाति ) विदूषकः—( सहर्षमुपसृत्य सस्मितम् ) सुसंगदे, सरिसो क्खु तुए किदो कंचणमालाए बेसो ! अध साअरिआ कहिं दाणिं ? (ङ) काञ्चनमाला—( अङ्गुल्या दर्शयन्ती ) णं एसा । (च) विदूषकः—( दृष्ट्वा सविस्मयम् ) एसा फुडं ज्जेव्व बासब- दत्ता ! (छ) (क) ततः त