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रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

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तृतीयोऽङ्कः 255 दुव्वअणेहिं कडुइदाइं सोत्ताइं, सुहाबेदु मउमहुरबअणोब- ण्णासो¹ । (क) वासवदत्ता—(अपवार्य सरोषस्मितम्² ) हंजे कंचणमाले ! अहं ईदिसी कडुवअणा³ ! अज्जवसंतओ उण पिअंबदो ! (ख) काञ्चनमाला—(अपवार्याङ्गुल्या तर्ज्जयन्ती⁴) हुदास, सुमरिस्ससि एदं वअणम् । (ग) विदूषकः—(विलोक्य) भो वअस्स ! पेक्ख पेक्ख—एसो क्खु कुबितकामिणीकपोलसन्निहो पुव्वदिसं⁵ पआसअंतो उदिदो भगवं मिअलंछणो। (घ) राजा—(निरूप्य सस्पृहम् ) प्रिये, पश्य पश्य— आरुह्य शैलशिखरं त्वद्वदनापहृतकान्तिसर्वस्वः । , प्रतिकर्त्तुमिवोङ्कतः स्थितः पुरस्तान्निशानाथः ॥१२

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