भारतकोश
रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

रत्नावली नाटिका (सम्राट हर्षवर्धन - शास्त्रीय नाटिका रत्न सम्पूर्ण ४ अङ्क सान्वय सटीक)

Ratnavali Natika of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished520 पृष्ठ

पृष्ठ 423, कुल 520 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 423

378 : रत्नावली Oh my father! Oh, mother! Where are you? Give me reply. (Falls and faints) Vāsava—(In a hurry) Oh chamberlain! Is this my sister Ratnávalī? Bábhravya—It is, Madam! Vāsava—(Embracing Ratnávalī) Sister! Be composed. King—Is this the daughter of Vikramabáhu, born of high family—the sovereign of Simhala! विदूषकः¹—रअणावलिं पेक्खिअ पढमे एव्व जाणिदं² मए ण क्खु सामञ्जणस्स ईटिसो परिच्छदोत्ति । (क) वसुभूतिः—( उत्थाय ) राजपुत्रि ! समाश्वसिहि, समाश्व- सिहि। नन्वियं ज्यायसी ते भगिनो दुःखमास्ते। तत् परि- ष्वजस्वैनाम्। रत्नावली—( समाश्वस्य राजानं तिर्यगवलोक्य स्वगतम् ) किदावराहा क्खु अहं देवीए ण सक्णोमि मुहं दंसिदुं। ( इत्यधोमुखी तिष्ठति ) (ख) वासवदत्ता—( सास्त्रं बाहू प्रसार्य ) एहि अदिनिट्ठुरे! दाणिं पिअभइणिए! सिणेहं दंसेहि। ( इति कण्ठे गृह्णाति ) (ग) (क) रत्नावलीं प्रेक्ष्य प्रथम एव ज्ञातं मया न खलु सामान्यजनस्य ईदृशः परिच्छद इति। (ख) कृतापराधा खलु अहं देव्यै न शक्नोमि मुखं दर्शयितुम्। (ग) एहि अतिनिष्ठुरे! इदानीं प्रियभगिनि! स्नेहं दर्शय।

  1. ( रत्नमालां स्पृशन् स्वगतम् )
  2. पढमं ज्ञेव्व मए जाणिदं।