ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1029, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुसन्दृक्ते स्वनीक प्रतीकं वि यद्द्युक्मो न रोचस उपाके. दिवो न ते तन्यतुरेति शुष्मश्चित्रो न सूरः प्रति चक्षि भानुम्.. (६) हे शोभनतेज वाले अग्नि! तुम जिस समय सूर्य के समान हमारे पास विशेषरूप से चमकते हो. उस समय तुम्हारा रूप भली-भांति दर्शनीय होता है. तुम्हारा तेज स्वर्ग से वज्र के समान निकलता है. तुम सुंदर सूर्य के समान अपना प्रकाश फैलाते हो. (६) यथा वः स्वाहाग्नये दाशेम परीळाभिर्घृतवद्भिश्च हव्यैः. तेभिर्नो अग्ने अमितैर्महोभिः शतं पूर्भिरायसीभिर्नि पाहि.. (७) हे अग्नि! हम जिस प्रकार गव्य एवं घी आदि मिले हव्य द्वारा स्वाहा शब्द के साथ तुम्हें आहुति देते हैं, उसी प्रकार तुम असीमित तेजों के साथ लौहनिर्मित सौ नगरियों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७) या वा ते सन्ति दाशुषे अधृष्टा गिरो वा याभिर्नृवतीरुरुष्याः. ताभिर्नः सूनो सहसो नि पाहि स्मत्सूरीञ्जरितॄञ्जातवेदः.. (८) हे बलपुत्र जातवेद एवं दानशील अग्नि! तुम अपनी शिखाओं एवं संतानयुक्त प्रजाओं की रक्षा करने वाले वचनों द्वारा हमारी रक्षा करो तथा प्रशंसनीय हव्य देने वाले स्तोताओं की रक्षा करो. (८) निर्यत्पूतेव स्वधितिः शुचिर्गात् स्वया कृपा तन्वा३ रोचमानः. आ यो मात्रोरुशेन्त्यो जनिष्ट देवयज्याय सुक्रतुः पावकः.. (९) विशुद्ध अग्नि जिस समय अपनी विशाल कृपा से दीप्त होकर काष्ठ से तेज फरसे के समान निकलते हैं, उस समय कमनीय, शोभनकर्मों वाले, पावक एवं मातारूप दो अरणियों से उत्पन्न अग्नि यज्ञ के योग्य बनते हैं. (९) एता नो अग्ने सौभगा दिदीह्यपि क्रतुं सुचेतसं वतेम. विश्वा स्तोतृभ्यो गृणते च सन्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०) हे अग्नि! हमें ये ही धन प्रदान करो. हम यज्ञकर्म करने वाला तथा उत्तम ज्ञानयुक्त पुत्र प्राप्त करें. सारा धन स्तोताओं एवं गान करने वालों को मिले. तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (१०) सूक्त—४ देवता—अग्नि प्र वः शुक्राय भानवे भरध्वं हव्यं मतिं चाग्नये सुपूतम्. यो दैव्यानि मानुषा जनूंष्यन्तर्विश्वानि विद्मना जिगाति.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*