ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1030, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे हव्यवहन करने वाले लोगो! तुम शुभ एवं दीप्ति के लिए शुद्ध हव्य एवं स्तुति समर्पित करो. अग्नि देवों तथा मानवों से उत्पन्न सभी पदार्थों के मध्य अपनी बुद्धि द्वारा चलते हैं. (१) स गृत्सो अग्निस्तरुणश्चिदस्तु यतो यविष्ठो अजनिष्ट मातुः. सं यो वना युवते शुचिदन् भूरि चिदन्ना समिदत्ति सद्यः.. (२) जो अतिशय युवा अग्नि मातारूप अरणियों से उत्पन्न हुए हैं, वे ही मेधावी अग्नि तरुण बनें. दीप्ति ज्वालारूपी दांतों वाले अग्नि वनों को आत्मसात् करते हैं एवं शीघ्र ही बहुत से अन्नों को खाते हैं. (२) अस्य देवस्य संसद्यनीके यं मर्तासः श्येतं जगृभ्रे. नि यो गृभं पौरुषेयीमुवोच दुरोकमग्निरयवे शुशोच.. (३) मनुष्य शुभ्र अग्नि को प्रमुख स्थान में गृहीत करते हैं. अग्नि मनुष्यों द्वारा की गई सेवा स्वीकार करते हैं. वे मानवों के कल्याण के लिए इस प्रकार दीप्त होते हैं कि शत्रु उन्हें सहन नहीं कर पाते. (३) अयं कविरकविषु प्रचेता मर्तेष्वग्निरमृतो नि धायि. स मा नो अत्र जुहुरः सहस्वः सदा त्वे सुमनसः स्याम.. (४) कवि, प्रकाशक एवं मरणरहित अग्नि अकवि एवं मरणधर्मा लोगों में विराजमान हैं. हे शक्तिशाली अग्नि! हम लोक में तुम्हारे प्रति शोभनमन वाले हों. तुम हमारी हिंसा मत करना. (४) आ यो योनिं देवकृतं ससाद क्रत्वा ह्य१ग्निरमृताँ अतारीत्. तमोषधीश्च वनिनश्च गर्भं भूमिश्च विश्वधायसं बिभर्ति.. (५) अग्नि ने बुद्धि द्वारा देवों को तारा है. वे देवों द्वारा बनाए हुए स्थान पर बैठते हैं. ओषधियां, वृक्ष एवं भूमि सबके धारणकर्त्ता एवं गर्भरूप को अपने में रखते हैं. (५) ईशे ह्य१ग्निरमृतस्य भूरेरीशे रायः सुवीर्यस्य दातोः. मा त्वा वयं सहसावन्नवीरा माप्सवः परि षदाम मादुवः.. (६) अग्नि अधिक मात्रा में अमृत देने में समर्थ हैं. वे उत्तम वीर्य वाला धन दे सकते हैं. हे बलवान् अग्नि! हम संतानहीन, रूपरहित एवं बिना सेवा के न बैठें. (६) परिषद्यं ह्यररणस्य रेक्णो नित्यस्य रायः पतयः स्याम. न शेषो अग्ने अन्यजातमस्त्यचेतानस्य मा पथो वि दुक्षः.. (७) ऋणरहित व्यक्ति का धन पर्याप्त होता है. हम नित्य धन के स्वामी हों. हे अग्नि! हमारी ebook converter DEMO Watermarks*