ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1038, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवृषा हरिः शुचिरा भाति भासा धियो हिन्वान उशतीरजीगः.. (१) अग्नि उषा के प्रेमी सूर्य के समान विस्तृत तेज का आश्रय लेते हैं. अत्यंत दीप्तिशाली, अभिलाषापूरक, हव्य की प्रेरणा देने वाले एवं शुचि अग्नि यज्ञकर्मों को प्रेरित करते हुए अपनी दीप्ति से प्रकाशित करते हैं एवं अपने अभिलाषियों को जागृत करते हैं. (१) स्वर्ष्ण वस्तोरुषसामरोचि यज्ञं तन्वाना उशिजो न मन्म. अग्निर्जन्मानि देव आ वि विद्वान्द्रवद् दूतो देवयावा वनिष्ठः.. (२) अग्नि दिन में उषा के सामने सूर्य के समान दीप्त होते हैं. यज्ञ का विस्तार करने वाले ऋत्विज् सुंदर स्तोत्र पढ़ते हैं. विद्वान्, देवों के दूत, देवों के पास जाने वाले एवं अतिशयदाता अग्नि सबको द्रवित करते हैं. (२) अच्छा गिरो मतयो देवयन्तीरग्निं यन्ति द्रविणं भिक्षमाणाः. सुसन्दृशं सुप्रतीकं स्वञ्चं हव्यवाहमरतिं मानुषाणाम्.. (३) देवों की अभिलाषा करती हुई व धन की याचना करती हुई स्तुतिरूप वाणियां देखने में शोभन, सुंदर रूप वाले, उत्तम गति वाले, हव्यवहनकर्त्ता एवं मानवों के स्वामी अग्नि के सामने जाती हैं. (३) इन्द्रं नो अग्ने वसुभिः सजोषा रुद्रं रुद्रेभिरा वहा बृहन्तम्. आदित्येभिरदितिं विश्वजन्यां बृहस्पतिंमृक्वभिर्विश्ववारम्.. (४) हे अग्नि! तुम वसुओं के साथ मिलकर इंद्र को एवं रुद्रों के साथ मिलकर महारुद्र को हमारे कल्याण के निमित्त बुलाओ. तुम आदित्यों के साथ मिलकर सबका हित चाहने वाली अदिति को तथा स्तुतियोग्य अंगिरा देवों के साथ मिलकर सबके प्रिय बृहस्पति को बुलाओ. (४) मन्द्रं होतारमुशिजो यविष्ठमग्निं विश ईळते अध्वरेषु. स हि क्षपावाँ अभवद्रयीणामतन्द्रो दूतो यजथाय देवान्.. (५) कामना करते हुए मनुष्य स्तुतियोग्य व अतिशय युवा अग्नि की स्तुति यज्ञों में करते हैं. रात्रि के स्वामी अग्नि यज्ञ के निमित्त हव्यदाता की ओर से आलस्यरहित दूत बने थे. (५) सूक्त—११ देवता—अग्नि महाँ अस्यध्वरस्य प्रकेतो न ऋते त्वदमृता मादयन्ते. आ विश्वेभिः सरथं याहि देवैर्र्यग्ने होता प्रथमः सदेह.. (१) हे यज्ञ का विज्ञापन करने वाले अग्नि! तुम महान् हो. तुम्हारे बिना देवगण प्रसन्न नहीं ebook converter DEMO Watermarks*