भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1047, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1047

रहने पर भी भृगुवंशी एवं द्रुह्युवंशी योद्धाओं ने सुदास एवं तुर्वश को आमने-सामने कर दिया. इंद्र ने इन दोनों में से अपने मित्र सुदास का उद्धार कर दिया एवं तुर्वश को मार डाला. (६) आ पक्थासो भलानसो भनन्तालिनासो विषाणिनः शिवासः. आ योऽनयत्सधमा आर्यस्य गव्या तृत्सुभ्यो अजगन्धुधा नॄन्.. (७) हव्यों को पकाने वाले, भद्रमुख, तपस्या के कारण दुर्बल, हाथ में सींग लिए हुए एवं सारे संसार के कल्याणकारी लोग इंद्र की स्तुति करते हैं. इंद्र सोमपान से प्रमत्त होकर आर्यों की गाएं हिंसकों से छुड़ा लाए थे. इंद्र ने गाएं प्राप्त की थीं एवं युद्ध में शत्रुओं को मारा था. (७) दुराध्यो३ अदितिं सेवयन्तोऽचेतसो वि जगृभ्रे परुष्णीम्. मह्नाविष्यक् पृथिवीं पत्यमानः पशूष्कविरशयच्चायमानः. (८) बुरे विचारों वाले एवं मंदबुद्धि शत्रुओं ने विशाल परुष्णी नदी को खोदकर उसके तट गिरा दिए थे. इंद्र की कृपा से सुदास धरती पर विस्तृत हो गए और उन्होंने चायमान के पुत्र कवि को पालतू पशु के समान मारकर धरती पर सुला दिया था. (८) ईयुर्थं न न्यर्थं परुष्णीमाशुश्चनेदभिपित्वं जगाम. सुदास इन्द्रः सुतुकाँ अमित्रानरनध्यन्मनुषे वध्रिवाचः.. (९) इंद्र द्वारा किनारे ठीक करने पर परुष्णी नदी का जल उचित दिशा में बहने लगा, उसका इधर-उधर जाना रुक गया. सुदास का अश्व भी अपने मार्ग पर चला. इंद्र ने सुदास के कल्याण के लिए व्यर्थ बातें करने वाले शत्रुओं को संतानसहित वश में किया था. (९) ईयुर्गावो न यवसादगोपा यथाकृतमभि मित्रं चितासः. पृश्निगावः पृश्निनिप्रेषितासः श्रुष्टिं चक्रुर्नियुतो रन्तयश्च.. (१०) जिस प्रकार बिना ग्वाले की गाएं जौ के खेत की ओर जाती हैं, उसी प्रकार पृश्नि माता द्वारा भेजे गए एवं परस्पर सम्मिलित मरुद्गण पूर्व निश्चय के अनुसार अपने मित्र इंद्र की ओर गए थे. मरुतों के घोड़े भी प्रसन्न होकर इंद्र की ओर गए. (१०) एकं च यो विंशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोर्जनान्राजा न्यस्तः. दस्मो न सद्मन्नि शिशाति बर्हिः शूरः सर्गमकृणोदिन्द्र एषाम्.. (११) राजा सुदास ने कीर्ति लाभ करने के लिए परुष्णी नदी के दोनों तटों पर बसे हुए इक्कीस मनुष्यों को मार डाला. युवा अध्वर्यु जिस प्रकार यज्ञशाला में कुशों को काटता है, उसी प्रकार सुदास ने शत्रुओं को काटा. इंद्र ने सुदास की सहायता के लिए मरुतों को उत्पन्न किया है. (११) अध श्रुतं कवषं वृद्धमप्स्वनु द्रुह्युं नि वृणग्वज्रबाहुः. ebook converter DEMO Watermarks*