ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1056, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंयस्ते मदो युज्यश्चारुरस्ति येन वृत्राणि हर्यश्व हंसि. स त्वामिन्द्र प्रभूवसो ममत्तु.. (२) हे हरि नामक घोड़ों के स्वामी एवं अधिक धन वाले इंद्र! जो सोम तुम्हारे अनुकूल भली प्रकार निचोड़ा गया एवं नशीला है एवं जिसे पीकर तुम राक्षसों को मारते हो, वह सोमरस तुम्हें प्रसन्न बनावे. (२) बोधा सु मे मघवन्वाचमेमां यां ते वसिष्ठो अर्चति प्रशस्तिम्. इमा ब्रह्म सधमादे जुषस्व.. (३) हे धनस्वामी इंद्र! मैं वसिष्ठ तुम्हारी प्रशंसा के रूप में जो बातें कहता हूं, उन्हें भली प्रकार समझो एवं यज्ञ में उन्हें स्वीकार करो. (३) श्रुधी हवं विपिपानस्याद्रेर्बोधा विप्रस्यार्चतो मनीषाम्. कृष्वा दुवांस्यन्तमा सचेमा.. (४) हे इंद्र! मुझ सोमपानकर्त्ता के पत्थर की पुकार सुनो एवं स्तुति करने वाले विद्वान् की स्तुति समझो. तुम मेरे सहायक बनकर मेरी इन सेवाओं को समझो. (४) न ते गिरो अपि मृष्ये तुरस्य न सुष्टुतिमसुर्यस्य विद्वान्. सदा ते नाम स्वयशो विवक्मि.. (५) हे शत्रुहिंसक इंद्र! तुम्हारी शक्ति को जानने वाला मैं तुम्हारी स्तुतियों को नहीं त्याग सकता. मैं तुम्हारा असाधारण यशवाला नाम सदा बोलूंगा. (५) भूरि हि ते सवना मानुषेषु भूरि मनीषी हवते त्वामित्. मारे अस्मन्मघवञ्ज्योक्कः.. (६) हे इंद्र! मनुष्यों में तुम्हारे बहुत से सवन हैं. स्तोता तुम्हें ही अधिक बुलाता है. चिरकाल तक अपने को हमसे अलग मत रखना. (६) तुभ्येदिमा सवना शूर विश्वा तुभ्यं ब्रह्माणि वर्धना कृणोमि. त्वं नृभिर्हव्यो विश्वधासि.. (७) हे शूर इंद्र! ये सब सवन तुम्हारे हेतु ही हैं. ये उन्नतिकारक स्तोत्र मैं तुम्हारे निमित्त ही बोलता हूं. तुम अनेक प्रकार से मानवों द्वारा बुलाने योग्य हो. (७) नू चिन्नु ते मन्यमानस्य दस्मोदश्रुवन्ति महिमानमुग्र. न वीर्यमिन्द्र ते न राधः.. (८) हे दर्शनीय इंद्र! तुम्हारी स्तुतियां सुनकर तुम्हारी महिमा कौन नहीं जानेगा? हे उग्र इंद्र! ebook converter DEMO Watermarks*