ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1134, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूक्त—८३ देवता—इंद्र व वरुण युवां नरा पश्यमानास आप्यं प्राचा गव्यन्तः पृथुपर्शवो ययुः. दासा च वृत्रा हतमार्याणि च सुदासमिन्द्रावरुणावसावतम्.. (१) हे नेता इंद्र एवं वरुण! मोटे फरसे वाले यजमान तुम्हारी मित्रता चाहते हुए गाय पाने की अभिलाषा से पूर्व की ओर गए. तुम दासों, बाधकों एवं यज्ञपरायण शत्रुओं का नाश करो एवं रक्षासाधनों द्वारा सुदास की रक्षा करो. (१) यत्रा नरः समयन्ते कृतध्वजो यस्मिन्नाजा भवति किं चन प्रियम्. यत्रा भयन्ते भुवना स्वर्दृशस्तत्रा न इन्द्रावरुणाधि वोचतम्.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! उस युद्ध में तुम हमारे पक्षपात की बात करना, जिस में मनुष्य झंडे उठाकर लड़ने के लिए मिलते हैं, जिस में कुछ भी प्रिय नहीं होता एवं प्राणी जिस में स्वर्ग के दर्शन करते हैं. (२) सं भूम्या अन्ता ध्वसिरा अदृक्षतेन्द्रावरुणा दिवि घोष आरुहत्. अस्थुर्जनानामुप मामरातयोऽर्वागवसा हवनश्रुता गतम्.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! धरती की सब फसलें सैनिकों द्वारा ध्वस्त दिखाई दे रही हैं एवं उनका कोलाहल अंतरिक्ष में फैल रहा है. मेरे योद्धाओं के समस्त विरोधी मेरे समीप आ गए हैं. हे पुकार सुनने वालो! रक्षासाधनों के साथ हमारे सामने आओ. (३) इन्द्रावरुणा वधनाभिरप्रति भेदं वन्वन्ता प्र सुदासमावतम्. ब्रह्माण्येषां शृणुतं हवीमनि सत्या तृत्सूनामभवत्पुरोहितिः.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! तुमने आयुधों द्वारा वश में न होने वाले भेद को मारा एवं राजा सुदास की रक्षा की. तुमने मेरे यजमान तृत्सुवंशीय ऋषियों की स्तुतियां सुनीं एवं युद्धकाल में उनका पुरोहित कर्म सफल हुआ. (४) इन्द्रावरुणावभ्या तपन्ति माघान्यर्यो वनुषामरातयः. युवं हि वस्व उभयस्य राजथोऽध स्मा नोऽवतं पार्ये दिवि.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! शत्रुओं के आयु मुझे घेर रहे हैं एवं हिंसकों के बीच फंसे मुझको शत्रु बाधा पहुंचा रहे हैं. तुम दोनों प्रकार की संपत्तियों के स्वामी हो, अतः युद्ध के दिन हमारी रक्षा करो. (५) युवां हवन्त उभयाय आजिष्विन्द्रं च वस्वो वरुणं च सातये. यत्र राजभिर्दशभिर्निबाधितं प्र सुदासमावतं तृत्सुभिः सह.. (६)