ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
सूक्त—८३ देवता—इंद्र व वरुण युवां नरा पश्यमानास आप्यं प्राचा गव्यन्तः पृथुपर्शवो ययुः. दासा च वृत्रा हतमार्याणि च सुदासमिन्द्रावरुणावसावतम्.. (१) हे नेता इंद्र एवं वरुण! मोटे फरसे वाले यजमान तुम्हारी मित्रता चाहते हुए गाय पाने की अभिलाषा से पूर्व की ओर गए. तुम दासों, बाधकों एवं यज्ञपरायण शत्रुओं का नाश करो एवं रक्षासाधनों द्वारा सुदास की रक्षा करो. (१) यत्रा नरः समयन्ते कृतध्वजो यस्मिन्नाजा भवति किं चन प्रियम्. यत्रा भयन्ते भुवना स्वर्दृशस्तत्रा न इन्द्रावरुणाधि वोचतम्.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! उस युद्ध में तुम हमारे पक्षपात की बात करना, जिस में मनुष्य झंडे उठाकर लड़ने के लिए मिलते हैं, जिस में कुछ भी प्रिय नहीं होता एवं प्राणी जिस में स्वर्ग के दर्शन करते हैं. (२) सं भूम्या अन्ता ध्वसिरा अदृक्षतेन्द्रावरुणा दिवि घोष आरुहत्. अस्थुर्जनानामुप मामरातयोऽर्वागवसा हवनश्रुता गतम्.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! धरती की सब फसलें सैनिकों द्वारा ध्वस्त दिखाई दे रही हैं एवं उनका कोलाहल अंतरिक्ष में फैल रहा है. मेरे योद्धाओं के समस्त विरोधी मेरे समीप आ गए हैं. हे पुकार सुनने वालो! रक्षासाधनों के साथ हमारे सामने आओ. (३) इन्द्रावरुणा वधनाभिरप्रति भेदं वन्वन्ता प्र सुदासमावतम्. ब्रह्माण्येषां शृणुतं हवीमनि सत्या तृत्सूनामभवत्पुरोहितिः.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! तुमने आयुधों द्वारा वश में न होने वाले भेद को मारा एवं राजा सुदास की रक्षा की. तुमने मेरे यजमान तृत्सुवंशीय ऋषियों की स्तुतियां सुनीं एवं युद्धकाल में उनका पुरोहित कर्म सफल हुआ. (४) इन्द्रावरुणावभ्या तपन्ति माघान्यर्यो वनुषामरातयः. युवं हि वस्व उभयस्य राजथोऽध स्मा नोऽवतं पार्ये दिवि.. (५) हे इंद्र एवं वरुण! शत्रुओं के आयु मुझे घेर रहे हैं एवं हिंसकों के बीच फंसे मुझको शत्रु बाधा पहुंचा रहे हैं. तुम दोनों प्रकार की संपत्तियों के स्वामी हो, अतः युद्ध के दिन हमारी रक्षा करो. (५) युवां हवन्त उभयाय आजिष्विन्द्रं च वस्वो वरुणं च सातये. यत्र राजभिर्दशभिर्निबाधितं प्र सुदासमावतं तृत्सुभिः सह.. (६)
युद्ध के समय सुदास और तृत्सु दोनों धन पाने के लिए इंद्र एवं वरुण को बुलाते हैं. वहां तुमने दस राजाओं द्वारा पीड़ित सुदास के साथ तृत्सुओं को भी बचाया. (६) दश राजानः समिता अयज्यवः सुदासमिन्द्रावरुणा न युयुधुः. सत्या नृणामङ्ग्रसदामुपस्तुतिर्देवा एषामभवन्देवहूतिषु.. (७) हे इंद्र एवं वरुण! यज्ञ न करने वाले दस राजा मिलकर भी अकेले सुदास से युद्ध नहीं कर सके. हव्य धारण करने वाले नेतारूप ऋत्विजों की स्तुतियां भी सफल हुईं एवं उनके यज्ञों में सब देव उपस्थित हुए. (७) दाशराज्ञे परियत्ताय विश्वतः सुदास इन्द्रावरुणावशिक्षतम्. श्वित्यञ्चो यत्र नमसा कपर्दिनो धिया धीवन्तो अस्पन्त तृत्सवः.. (८) हे इंद्र एवं वरुण! जहां निर्मल, जटाधारी एवं यज्ञ-कर्म कर्त्ता तृत्सुओं ने हव्य अन्न एवं स्तुतियों से सेवा की, उसी दाशराज्ञ युद्ध में दस राजाओं द्वारा घिरे हुए सुदास को तुमने शक्तिशाली बनाया था. (८) वृत्राण्यन्यः समिथेषु जिघ्नते व्रतान्यन्यो अभि रक्षते सदा. हवामहे वां वृषणा सुवृक्तिभिरस्मे इन्द्रावरुणा शर्म यच्छतम्.. (९) हे इंद्र एवं वरुण! तुम में से एक संग्रामों में शत्रुओं का नाश करता है एवं दूसरा सदा यज्ञकर्मों की रक्षा करता है. हे अभिलाषापूरको! हम शोभनस्तुतियों द्वारा तुम्हें बुलाते हैं. तुम हमें सुख दो. (९) अस्मे इन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा द्युम्नं यच्छन्तु महि शर्म सप्रथः. अवध्रं ज्योतिरदितेरृतावृधो देवस्य श्लोकं सवितुर्मनामहे.. (१०) इंद्र, वरुण, मित्र एवं अर्यमा हमें धन एवं परम विस्तृत घर दें. यज्ञ की वृद्धि करने वाली अदिति की ज्योति हमारे लिए हानिकर न हो. हम सविता देव की स्तुति करें. (१०) सूक्त—८४ देवता—इंद्र व वरुण आ वां राजानावध्वरे ववृत्यां हव्येभिरिन्द्रावरुणा नमोभिः. प्र वां घृताची बाह्वोर्दधाना परि त्मना विषुरूपा जिगाति.. (१) हे सुशोभित इंद्र व वरुण! मैं इस यज्ञ में अन्न एवं स्तुतियों द्वारा तुम्हें बार-बार बुलाता हूं. हाथों में पकड़ी हुई व विविध रूप वाली जुहू (घी का चमचा) अपने आप तुम्हारी ओर जाती है. (१) युवो राष्ट्रं बृहदिन्वति द्यौर्यौ सेतुभिररज्जुभिः सिनीथः. ebook converter DEMO Watermarks*
परि नो हेळो वरुणस्य वृज्या उरुं न इन्द्रः कृणवदु लोकम्.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! तुम्हारा स्वर्गरूप विस्तृत राष्ट्र वर्षा द्वारा सबको प्रसन्न करता है. तुम पापियों को बिना रस्सी वाली बाधाओं अर्थात् रोगादि से बांधो. वरुण का क्रोध हमसे दूर जावे एवं इंद्र हमारे निवासस्थान को विस्तृत करें. (२) कृतं नो यज्ञं विदथेषु चारुं कृतं ब्रह्माणि सूरिषु प्रशस्ता. उपो रयिर्देवजूतो न एतु प्र णः स्पार्हाभिरूतिभिस्तिरेतम्.. (३) हे इंद्र एवं वरुण! हमारे घरों में होने वाले यज्ञ को शोभन बनाओ एवं हमारे स्तोताओं की स्तुतियां उत्तम करो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित धन हमारे पास आवे. तुम स्पृहणीय रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ. (३) अस्मे इन्द्रावरुणा विश्ववारं रयिं धत्तं वसुमन्तं पुरुक्षुम्. प्र य आदित्यो अनृता मिनात्यामिता शूरो दयते वसूनि.. (४) हे इंद्र एवं वरुण! हमारे लिए ऐसा धन दो जो सबके वरण करने योग्य हो एवं अन्न से पूरित निवासस्थान दो. जो शूर एवं अदितिपुत्र वरुण असत्य का नाश करते हैं, वे ही स्तोताओं को असीमित धन देते हैं. (४) इयमिन्द्रं वरुणमष्ट मे गीः प्रावत्तोके तनये तुतुजाना. सुरत्नासो देववीतिं गमेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) मेरी यह स्तुति इंद्र एवं वरुण के पास पहुंचे. मेरी स्तुति पुत्र एवं पौत्र की रक्षा का कारण बने. हम शोभनरत्न वाले होकर यज्ञ प्राप्त करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—८५ देवता—इंद्र व वरुण पुनीषे वामरक्षसं मनीषां सोममिन्द्राय वरुणाय जुह्वत्. घृतप्रतीकामुषसं न देवीं ता नो यामन्नुरुष्यतामभीके.. (१) हे इंद्र एवं वरुण! मैं तुम्हारे उद्देश्य से अग्नि में सोम की आहुति फेंकता हुआ उषा देवी के समान प्रदीप्त अवयव वाली एवं राक्षसों से असंपृक्त स्तुति अर्पित करता हूं. इंद्र व वरुण युद्ध में हमारी रक्षा करें. (१) स्पर्धन्ते वा उ देवहूये अत्र येषु ध्वजेषु दिद्यवः पतन्ति. युवं ताँ इन्द्रावरुणावमित्रान्हतं पराचः शर्वा विषूचः.. (२) हे इंद्र एवं वरुण! जिन युद्धों में शत्रु हमें ललकारते हैं एवं ध्वजाओं पर आयुध गिरते हैं, ebook converter DEMO Watermarks*
उन में तुम सब शत्रुओं को आयुधों से दूर भगाओ एवं उनका नाश करो. (२) आपश्चिद्धि स्वयशसः सदःसु देवीरिन्द्रं वरुणं देवता धुः. कृष्टीरन्यो धारयति प्रविक्ता वृत्राण्यन्यो अप्रतीनि हन्ति.. (३) स्वाधीन यशवाले एवं द्योतमान समस्त सोम घरों में इंद्र एवं वरुण देव को धारण करते हैं. इन में एक प्रजाओं को विभक्त करके पालन करता है एवं दूसरा अपराजित शत्रुओं को मारता है. (३) स सुक्रतुर्ऋतचिदस्तु होता य आदित्य शवसा वां नमस्वान्. आवर्वतदवसे वां हविष्मान्सदित्स सुविताय प्रयस्वान्.. (४) हे शक्तिशाली एवं अदितिपुत्र मित्रावरुण! जो नमस्कार के द्वारा तुम्हारी सेवा करता है, वही होता शोभन कर्मवाला एवं यज्ञदाता हो. जो व्यक्ति हव्ययुक्त होकर तुम्हें बार-बार बुलाता है, वह यजमान अन्न का स्वामी होकर फल पाने वाला बने. (४) इयमिन्द्रं वरुणमष्ट मे गीः प्रावत्तोके तनये तूतुजाना. सुरत्नासो देववीतिं गमेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) मेरी यह स्तुति इंद्र एवं वरुण के पास पहुंचे. मेरी स्तुति पुत्र एवं पौत्र की रक्षा का कारण बने. हम शोभनरत्न वाले होकर यज्ञ प्राप्त करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—८६ देवता—वरुण धीरा त्वस्य महिना जनूंषि वि यस्तस्तम्भ रोदसी चिदुर्वी. प्र नाकमृष्वं नुनुदे बृहन्तं द्विता नक्षत्रं पप्रथच्च भूम.. (१) वरुण के जन्म उनकी महिमा से स्थिर होते हैं. वरुण ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया है, महान् आकाश और दर्शनीय नक्षत्रों को दो बार प्रेरणा दी है तथा धरती को विशाल बनाया है. (१) उत स्वया तन्वा३ सं वदे तत्कदा न्व१न्तर्वरुणे भुवानि. किं मे हव्यमहृणानो जुषेत कदा मृळीकं सुमना अभि ख्यम्.. (२) क्या मैं अपने शरीर के साथ अथवा वरुण के साथ स्थिर रहूं? क्या मैं वरुण में अपना मन संलग्न करूं? वरुण क्रोध न करते हुए मेरे हव्य को क्यों स्वीकार करेंगे? मैं शोभनमन से सुंदर वरुण को कब देखूंगा. (२) पृच्छे तदेनो वरुण दिदृक्षूपो एमि चिकितुषो विपृच्छम्. ebook converter DEMO Watermarks*
समानमिन्मे कवयश्चिदाहुरयं ह तुभ्यं वरुणो हृणीते.. (३) हे वरुण! तुम्हारे दर्शन का इच्छुक होकर मैं वह पाप पूछता हूं. मैं विविध प्रश्न पूछने के लिए विद्वानों के समीप गया हूं. सब विद्वानों ने मुझसे एक ही बात कही है कि वरुण तुमसे नाराज हैं. (३) किमाग आस वरुण ज्येष्ठं यत्स्तोतारं जिघांससि सखायम्. प्र तन्मे वोचो दूळभ स्वधावोऽव त्वानेना नमसा तुर इयाम्.. (४) हे वरुण! मेरा ऐसा क्या महान् अपराध है कि तुम मेरे मित्र स्तोता को मारना चाहते हो? हे अपराजेय एवं तेजस्वी वरुण! मुझे वह अपराध बताओ जिससे मैं उसका प्रायश्चित्त करके निरपराध बनूं एवं नमस्कार के साथ शीघ्र तुम्हारे समीप आऊं. (४) अवि द्रुग्धानि पित्र्या सृजा नोऽव या वयं चकृमा तनूभिः. अव राजन्पशुतृपं न तायुं सृजा वत्सं न दाम्नो वसिष्ठम्.. (५) हे वरुण! हमारी पैतृक द्रोहभावना को हमसे अलग करो. हमने अपने शरीर से जो अपराध किया है, उससे भी हमें मुक्त करो. हे सुशोभित वरुण! मुझ वसिष्ठ की दशा चुराकर लाए पशु को प्रायश्चित्तरूप में घास खिलाने अथवा रस्सी से बंधे बछड़े के समान है. तुम मुझे पाप से छुड़ाओ. (५) न स स्वो दक्षो वरुण ध्रुतिः सा सुरा मन्युर्विभीदको अचित्तिः. अस्ति ज्यायान्कनीयस उपारे स्वप्नश्चनेदनृतस्य प्रयोता.. (६) हे वरुण! वह पाप हमारे बल के कारण नहीं है. प्रमाद, क्रोध, जुआ अथवा अज्ञान के रूप में देवगति ही उसका कारण है. छोटे को पाप की ओर प्रवृत्त करने में बड़ा कारण बनता है. स्वप्न भी पाप से मिलाने वाला है. (६) अरं दासो न मीळहुषे कराण्यहं देवाय भूर्णयेऽनागाः. अचेतयदचितो देवो अर्यो गृत्सं राये कवितरो जुनाति.. (७) मैं पापरहित होकर अभिलाषापूरक एवं विश्वपालक वरुण की सेवा दास के समान पर्याप्तरूप में करूंगा. सबके स्वामी वरुण देव, मुझ ज्ञानरहित को ज्ञान संपन्न करें. अतिशय विद्वान् वरुण स्तोता को धन पाने के लिए प्रेरित करें. (७) अयं सु तुभ्यं वरुण स्वधावो हृदि स्तोम उपश्रितश्चिदस्तु. शं नः क्षेमे शमु योगे नो अस्तु यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे अन्नस्वामी वरुण! तुम्हारे निमित्त बनाया हुआ यह स्तोत्र तुम्हारे मन में समा जाए. हमारा क्षेत्र और योग मंगलमय हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—८७ देवता—वरुण
(८) सूक्त—८७ देवता—वरुण रदत्पथो वरुणः सूर्याय प्राणॉंसि समुद्रिया नदीनाम्. सर्गो न सृष्टो अर्वतीर्ऋतायञ्चकार महीरवनीरहभ्यः.. (१) वरुण ने सूर्य के लिए अंतरिक्ष में मार्ग दिया व सागर का जल सरिताओं को प्रदान किया. घोड़ा जिस प्रकार घोड़ी के समीप जाता है, उसी प्रकार शीघ्रगमन के लिए वरुण ने दिन से महान् रातों को अलग किया. (१) आत्मा ते वातो रज आ नवीनोत्पशुर्न भूर्णिर्यवसे ससवान्. अन्तर्मही बृहती रोदसीमे विश्वा ते धाम वरुण प्रियाणि.. (२) हे वरुण! तुम्हारे द्वारा प्रेरित वायु जगत् की आत्मा है एवं जल को सब ओर भेजता है. जैसे घास डालने पर पशु बोझा ढोता है, उसी प्रकार वायु अन्न पाकर विश्व का भरण करता है. विस्तृत द्यावा-पृथिवी के मध्य में स्थित तुम्हारे सभी स्थान प्रिय हैं. (२) परि स्पशो वरुणस्य स्मदिष्टा उभे पश्यन्ति रोदसी सुमेके. ऋतावानः कवयो यज्ञधीराः प्रचेतसो य इषयन्त मन्म.. (३) प्रशंसनीय गति वाले वरुण के सब सहायक शोभनरूप वाली द्यावा-पृथिवी को भली- भांति देखते हैं. वे कर्मयुक्त, यज्ञ करने के लिए दृढ़, बुद्धिमान् एवं वरुण की स्तुति करने वाले कवियों को भी देखते हैं. (३) उवाच मे वरुणो मेधिराय त्रिः सप्त नामाघ्न्या बिभर्ति. विद्वान्पदस्य गुह्या न वोचद्युगाय विप्र उपराय शिक्षन्.. (४) वरुण ने मुझ मेधावी से कहा था कि धरती इक्कीस नाम धारण करती है. विद्वान् एवं मेधावी वरुण ने मुझ अंतेवासी को उपदेश देते हुए ब्रह्मलोक की गुप्त बातों को भी बताया है. (४) तिस्रो द्यावो निहिता अन्तरस्मिन्तिस्रो भूमीरुपराः षड्विधानाः. गृत्सो राजा वरुणश्चक्र एतं दिवि प्रेङ्खं हिरण्ययं शुभे कम्.. (५) इन वरुण में तीन स्वर्ग, तीन भूमियां एवं छः दशाएं निहित हैं. प्रशंसनीय स्वामी वरुण ने सुनहरे झूले के समान सूर्य को प्रकाश के लिए बनाया है. (५) अव सिन्धुं वरुणो द्यौरिव स्थाद् द्रप्सो न श्वेतो मृगस्तुविष्मान्. गम्भीरशंसो रजसो विमानः सुपारक्षत्रः सतो अस्य राजा.. (६) ebook converter DEMO Watermarks*
सूर्य के समान दीप्त, पानी की बूंद के समान श्वेत, हरिण के समान शक्तिशाली, महान् स्तोत्रों वाले, जल के रचयिता, दुःख से छुटकारा दिलाने की शक्ति से युक्त एवं इस संसार के स्वामी वरुण ने सागर को स्थिर बनाया है. (६) यो मृळयाति चक्रुषे चिदागो वयं स्याम वरुणे अनागाः. अनु व्रतान्यदितेर्ऋधन्तो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) वरुण अपराध करने वाले पर भी दया करते हैं. मैं दीनतारहित वरुण से संबंधित व्रतों को बढ़ाता हुआ पापरहित बनूंगा. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—८८ देवता—वरुण प्र शुन्ध्युवं वरुणाय प्रेष्ठां मतिं वसिष्ठ मीळहुषे भरस्व. य ईमर्वाञ्चं करते यजत्रं सहस्रामघं वृषणं बृहन्तम्.. (१) हे वसिष्ठ! तुम अभिलाषापूरक वरुण के प्रति स्वयं शुद्ध एवं प्रिय लगने वाली स्तुति उच्चारित करो. वे यज्ञ योग्य, अनेक धनों के स्वामी, अभिलाषापूरक एवं विस्तृत सूर्य को हमारे सामने लाते हैं. (१) अधा न्वस्य सन्दृशं जगन्वानग्नेरनीकं वरुणस्य मंसि. स्वर्यदृशमन्निधिपा उ अन्धोऽभि मा वपुर्दृशये निनीयात्.. (२) मैं इस समय शीघ्रता से वरुण के दर्शन करके अग्नि की ज्वालाओं की स्तुति करता हूं. जिस समय वरुण पत्थरों की सहायता से निचोड़े गए शोभन सोमरस को अधिक मात्रा में पी लेते हैं, उस समय मुझे अपने शोभनरथ के दर्शन कराते हैं. (२) आ यद्रुहाव वरुणश्च नावं प्र यत्समुद्रमीरयाव मध्यम्. अधि यदपां स्नुभिश्चराव प्र प्रेङ्ख ईङ्खयावहै शुभे कम्.. (३) जिस समय मैं और वरुण नाव पर सवार हुए थे. नाव को हमने सागर के बीच चलाया था एवं जल पर तैरती हुई नाव पर हम थे, उस समय हमने नावरूपी झूले पर सुख के निमित्त क्रीड़ा की थी. (३) वसिष्ठं ह वरुणो नाव्याधादृषिं चकार स्वपा महोभिः. स्तोतारं विप्रः सुदिनत्वे अह्नां यान्नु द्यावस्ततन्वन्द्यादुषासः.. (४) मेधावी वरुण ने रात एवं दिन का विस्तार करते हुए उत्तम दिनों में स्तोता मुझ वसिष्ठ को नाव पर चढ़ाया था एवं रक्षासाधनों द्वारा शोभनकर्म वाला बनाया था. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
क्व१ त्यानि नौ सख्या बभूवुः सचावहे यदवृकं पुरा चित्. बृहन्तं मानं वरुण स्वधावः सहस्रद्वारं जगमा गृहं ते.. (५) हे वरुण! हमारी पुरातन मित्रता कहां हुई थी? हम उसी पुरानी एवं विनाशरहित मित्रता को निभा रहे हैं. हे अन्नस्वामी वरुण! मैं तुम्हारे अति विस्तृत एवं द्वारों वाले घर में जाऊं. (५) य आपिर्नित्यो वरुण प्रियः सन्त्वामागांसि कृणवत्सखा ते. मा त एनस्वन्तो यक्षिन् भुजेम यन्धि ष्मा विप्रः स्तुवते वरूथम्.. (६) हे वरुण! जो वसिष्ठ तुम्हारा सगा पुत्र है, जिसने पूर्वकाल में तुम्हारा प्रिय बनकर अपराध किए हैं, वह इस समय तुम्हारा मित्र हो. हे यज्ञस्वामी वरुण! हम पापयुक्त होकर भोगों को न भोगें. हे मेधावी वरुण! तुम स्तोता को घर दो. (६) ध्रुवासु त्वासु क्षितिषु क्षियन्तो व्य१स्मत् पाशं वरुणो मुमोचत्. अवो वन्वाना अदितेरुपस्थाद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः... (७) हम ध्रुवभूमि पर निवास करते हुए स्तुति बोलते हैं. वरुण हमारे फंदों को छुड़ाएं. हम टुकड़े न होने वाली धरती के पास से वरुण के रक्षासाधनों का भोग करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—८९ देवता—वरुण मो षु वरुण मृन्मयं गृहं राजन्नहं गमम्. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (१) हे स्वामी वरुण! मैं तुम्हारे द्वारा दिया हुआ मिट्टी का घर प्राप्त न करूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (१) यदेमि प्रस्फुरन्निव दृतिर्न ध्मातो अद्रिवः. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (२) हे आयुधों वाले वरुण! तुम्हारे द्वारा बंधा हुआ मैं ठंड से कांपता हुआ एवं वायुप्रेरित बादल के समान आता हूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (२) क्रत्वः समह दीनता प्रतीपं जगमा शुचे. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (३) हे धनस्वामी एवं निर्मल वरुण! मैं असमर्थता के कारण कर्त्तव्य कर्मों का विरोधी बना हूं. हे शोभनधन वाले वरुण! मुझे सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (३) अपां मध्ये तस्थिवांसं तृष्णाविदज्जरितारम्. मृळा सुक्षत्र मृळय.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*
हे शोभनधन वाले वरुण! सागर में रहकर भी प्यासे मुझ स्तोता को सुखी बनाओ एवं मुझ पर दया करो. (४) यत्किं चेदं वरुण दैव्ये जनेऽभिद्रोहं मनुष्या३श्चरामसि. अचित्ती यत्तव धर्मा युयोपिम मा नस्तस्मादेनसो देव रीरिषः.. (५) हे वरुण! हम मनुष्य देवों के प्रति जो द्रोह करते हैं अथवा अज्ञानता के कारण तुम्हारे जिस यज्ञकर्म को भूल जाते हैं, उन पापों के कारण हमें मत मारना. (५) सूक्त—९० देवता—वायु प्र वीरया शुचयो दद्रिरे वामध्वर्युभिर्मधुमन्तः सुतासः. वह वायो नियुतो याह्यच्छा पिबा सुतस्यान्धसो मदाय.. (१) हे वीर वायु! अध्वर्युगण द्वारा तुम्हारे लिए शुद्ध एवं मधुर सोमरस दिया जाता है. तुम अपने घोड़ों को रथ में जोड़ो, हमारे सामने आओ एवं मादकता के हेतु हमारा निचोड़ा हुआ सोमरस पिओ. (१) ईशानाय प्रहुतिं यस्त आनट् शुचिं सोमं शुचिपास्तुभ्यं वायो. कृणोषि तं मर्त्येषु प्रशस्तं जातोजातो जायते वाज्यस्य.. (२) हे सबके स्वामी वायु! तुम्हें जो उत्तम आहुति देता है एवं हे सोमपानकर्त्ता वायु! जो तुम्हें पवित्र सोमरस देता है, उसे तुम सभी मनुष्यों में प्रसिद्ध बनाते हो. वह सर्वत्र प्रसिद्ध होकर धन का पात्र बनता है. (२) राये नु यं जज्ञतू रोदसीमे राये देवी धिषणा धाति देवम्. अध वायुं नियतः सश्चत स्वा उत श्वेतं वसुधितिं निरेके.. (३) इस द्यावा-पृथिवी ने वायु को धन के लिए उत्पन्न किया है एवं प्रकाशयुक्त स्तुति धन के लिए ही वायु देव को धारण करती है. इस समय वायु के अश्व उनकी सेवा करते हैं एवं दरिद्रता की स्थिति में वे घोड़े धनप्रदाता वायु को हमारे यज्ञ में लाते हैं. (३) उच्छन्नुषसः सुदिना अरिप्रा उरु ज्योतिर्विविदुद्दीध्यानाः. गव्यं चिदूर्वमुशिजो वि वव्रुस्तेषामनु प्रदिवः सस्रुरापः.. (४) शोभन दिन लाने वाली पापरहित उषाएं अंधकार मिटाएं एवं दीप्तिसंपन्न होकर वायु की कृपा से विस्तृत प्रकाश पावें. वायु की स्तुति करने वाले अंगिराओं ने गोधन प्राप्त किया. प्राचीन जल अंगिराओं के पीछे बहे. (४) ते सत्येन मनसा दीध्यानाः स्वेन युक्तासः क्रतुना वहन्ति. ebook converter DEMO Watermarks*
इन्द्रवायू वीरवाहं रथं वामीशानयोरभि पृक्षः सचन्ते.. (५) हे सबके स्वामी इंद्र एवं वायु! प्रसिद्ध यजमान सच्चे मन से स्तुति करते हुए एवं दीप्तिसंपन्न बनकर अपने कर्मों द्वारा तुम्हारे उस रथ को अपने यज्ञों में खींचते हैं, जो वीरों द्वारा खींचने योग्य हैं. यज्ञ में हव्यरूप अन्न तुम्हारी सेवा करते हैं. (५) ईशानासो ये दधते स्वर्णो गोभिरश्वेभिर्वसुभिर्हिरण्यैः. इन्द्रवायू सूरयो विश्वमायुर्वद्भिर्वीरैः पृतनासु सह्युः.. (६) हे इंद्र एवं वायु! जो सामर्थ्य वाले लोग हमें गांवों, घोड़ों, निवासस्थानों एवं स्वर्ण आदि धन के साथ सुख देते हैं, वे ही दाता युद्ध में घोड़ों एवं वीर पुरुषों की सहायता के सर्वत्र व्याप्त अन्न जीत लेते हैं. (६) अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः. वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) घोड़ों के समान हव्य-वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी रक्षा करो. (७) सूक्त—९१ देवता—वायु कुविदङ्ग नमसा ये वृद्धासः पुरा देवा अनवद्यास आसन्. ते वायवे मनवे बाधितायावासयन्नुषसं सूर्येण.. (१) प्राचीन काल में जिन वयोवृद्ध स्तोताओं ने वायु देव के हेतु शीघ्र बनाए गए बहुत से स्तोत्रों द्वारा प्रसिद्धि प्राप्त की, उन्होंने विपत्ति में पड़े मनुष्यों की रक्षा के निमित्त वायु को हव्य देने के लिए सूर्य के साथ उषा को संगत किया. (१) उशन्ता दूता न दभाय गोपा मासश्च पाथः शरदश्च पूर्वीः. इन्द्रवायू सुष्टुतिर्वामियाना मार्डीकमीट्टे सुवितं च नव्यम्.. (२) हे कामना करने योग्य, गतिशील एवं रक्षक इंद्र व वायु! तुम हमारी हिंसा न करके अनेक मासों एवं वर्षों तक हमारी रक्षा करना. हमारी शोभनस्तुति समीप जाती हुई तुमसे सुख एवं प्रशंसायोग्य उत्तम धन की याचना करती है. (२) पीवोअन्नाँ रयिवृधः सुमेधाः श्वेतः सिषक्ति नियुतामभिश्रीः. ते वायवे समनसो वि तस्थुर्विश्वेन्नरः स्वपत्यानि चक्रुः.. (३) शोभनबुद्धि वाले एवं अपने घोड़ों को आश्रय देने वाले श्वेतवर्ण वायु अधिक अन्न के
स्वामी एवं धनसंपन्न व्यक्तियों की सेवा करते हैं. समान मन वाले वे लोग भी वायु के लिए यज्ञ करने के विचार से स्थित हैं एवं अपनी संतान को लाभ देने वाले कार्य कर चुके हैं. (३) यावत्तरस्तन्वो३ यावदोजो यावन्नरश्चक्षसा दीध्यानाः. शुचिं सोमं शुचिपा पातमस्मे इन्द्रवायू सदतं बहिर्इदम्.. (४) हे पवित्र सोमरस को पीने वाले इंद्र एवं वायु! जब तक तुम्हारे शरीर की गति है, जब तक बल है एवं जब तक ऋत्विज् ज्ञानरूपी बल से दीप्तिशाली हैं, तब तक तुम हमारे पवित्र सोमरस को पिओ एवं इन कुशों पर बैठो. (४) नियुवाना नियुतः स्पार्हवीरा इन्द्रवायू सरथं यातमर्वाक्. इदं हि वां प्रभृतं मध्वो अग्रमध प्रीणाना वि मुमुक्तमस्मे.. (५) हे स्पृहायोऽग्य स्तोताओं वाले इंद्र एवं वायु! अपने घोड़ों को एक ही रथ में जोड़ो एवं हमारे सामने लाओ. इस मधुर सोमरस का उत्तम भाग तुम्हारे निमित्त है. तुम इसे पीकर प्रसन्न बनो एवं हमें पापों से छुड़ाओ. (५) या वां शतं नियुतो याः सहस्रमिन्द्रवायू विश्ववाराः सचन्ते. आभिर्यातं सुविदत्राभिर्वाक्पातं नरा प्रतिभृतस्य मध्वः.. (६) हे इंद्र एवं वायु! सबके द्वारा वरण करने योग्य तुम्हारे जो घोड़े सैकड़ों तथा हजारों की संख्या में तुम्हारी सेवा करते हैं, उन्हीं शोभन धनदाता अश्वों की सहायता से तुम हमारे सामने आओ. हे नेताओ! उत्तर-वेदी पर लाए गए सोम को पिओ. (६) अर्वन्तो न श्रवसो भिक्षमाणा इन्द्रवायू सुष्टुतिभिर्वसिष्ठाः. वाजयन्तः स्ववसे हुवेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) घोड़ों के समान हव्य वहन करने वाले, अन्न की प्रार्थना करने वाले एवं बल के इच्छुक वसिष्ठगण शोभनरक्षा के निमित्त उत्तम स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को बुलाते हैं. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (७) सूक्त—९२ देवता—वायु आ वायो भूष शुचिपा उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार. उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयम्.. (१) हे विशुद्ध सोमरस के पीने वाले वायु! हमारे पास आओ. हे सबके वरणीय वायु! तुम्हारे हजार घोड़े हैं. हे वायु! तुम जिस सोमरस को सबसे पहले पीने का अधिकार रखते हो, वही नशीला सोम पात्र में रखा है. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
प्र सोता जीरो अध्वरेश्वस्थात् सोममिन्द्राय वायवे पिबध्यै. प्र यद्द्वां मध्वो अग्रियं भरन्त्यध्वर्यवो देवयन्तः शचीभिः.. (२) शीघ्र काम करने वाले एवं सोमरस निचोड़ने वाले अध्वर्यु ने इंद्र तथा वायु को पीने के लिए यज्ञ में सोमरस स्थापित किया है. हे इंद्र एवं वायु! देवों की कामना करने वाले अध्वर्यु लोगों ने अपने कर्म द्वारा इस यज्ञ में सोमरस का उत्तम भाग तुम्हारे लिए तैयार किया है. (२) प्र याभिर्यासि दाश्वांसमच्छा नियुद्भिर्वायविष्टये दुरोणे. नि नो रयिं सुभोजसं युवस्व नि वीरं गव्यमश्व्यं च राधः.. (३) हे वायु! यज्ञशाला में स्थित हव्यदाता यजमान का यज्ञ पूर्ण करने के लिए जिन घोड़ों के द्वारा तुम उसके सामने जाते हो, उन्हीं की सहायता से हमारे यज्ञ में आओ. हमें शोभन अन्न वाला धन, वीरपुत्र, गायों एवं अश्वों के रूप में ऐश्वर्य प्रदान करो. (३) ये वायव इन्द्रमादनास आदेवासो नितोशनासो अर्यः. घ्नन्तो वृत्राणि सूरिभिः ष्याम सासह्वांसो युधा नृभिरमित्रान्.. (४) जो स्तोता अपनी स्तुतियों द्वारा इंद्र एवं वायु को तृप्त करने वाले एवं दिव्य गुणों से युक्त हैं, वे शत्रुओं का नाश करते हैं. उन्हीं स्तोताओं की सहायता से हम अपने शत्रुओं का नाश करते हुए शत्रुओं को युद्ध में हरावें. (४) आ नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वरं सहस्रिणीभिरुप याहि यज्ञम्. वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) हे वायु! अपने सैकड़ों एवं हजारों घोड़ों की सहायता से हमारे यज्ञ के पास आओ एवं इस यज्ञ में सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. हे देवो! रक्षासाधनों द्वारा हमारा सदा कल्याण करो. (५) सूक्त—९३ देवता—इंद्र व अग्नि शुचिं नु स्तोमं नवजातमद्येन्द्राग्नी वृत्रहणा जुषेथाम्. उभा हि वां सुहवा जोहवीमि ता वाजं सद्य उशते धेष्ठा.. (१) हे वृत्रहंता इंद्र एवं अग्नि! तुम मेरे पवित्र एवं इसी समय निमित्त स्तोत्र को आज सुनो. सुखपूर्वक बुलाने योग्य तुम दोनों को मैं बार-बार बुलाता हूं. जो यजमान तुम्हारी कामना करता है, उसे शीघ्र अन्न दो. (१) ता सानसी शवसाना हि भूतं साकंवृधा शवसा शूशुवांसा. क्षयन्तौ रायो यवसस्य भूरेः पृङ्क्तं वाजस्य स्थविरस्य घृष्वेः.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे सबके द्वारा सेवनीय इंद्र एवं अग्नि! तुम बल के समान शत्रुनाश करो. तुम एक साथ उन्नति करते हुए, बल द्वारा बढ़ते हुए एवं अधिक धन के स्वामी हो. तुम हमें शत्रुविनाशक एवं स्थूल अन्न दो. (२) उपो ह यदिदथं वाजिनो गुर्धीर्भिविप्राः प्रमतिमिच्छमानाः. अर्वन्तो न काष्ठां नक्षमाणा इन्द्राग्नी जोहुवतो नरस्ते.. (३) हव्य धारण करने वाले, बुद्धिमान् इंद्र एवं अग्नि की कृपा चाहने वाले जो यजमान अपनी कर्मभावना द्वारा यज्ञ को प्राप्त करते हैं, वे ही नेता लोग इंद्र व अग्निसंबंधी यज्ञकर्मों को व्याप्त करके उसी प्रकार उन्हें बार-बार बुलाते हैं, जैसे घोड़ा शीघ्र ही युद्धभूमि को व्याप्त कर लेता है. (३) गीर्भिर्विप्रः प्रमतिमिच्छमान ईट्टे रयिं यशसं पूर्वभाजम्. इन्द्राग्नी वृत्रहणा सुवज्रा प्र नो नव्येभिस्तिरतं देष्णैः.. (४) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम्हारी कृपाबुद्धि की इच्छा करने वाले वसिष्ठवंशी विप्र यश देने वाले एवं सर्वप्रथम उपभोग योग्य धन पाने के लिए तुम्हारी स्तुति करते हैं. हे शत्रुनाशक एवं शोभन आयुध वाले इंद्र व अग्नि! नवीन एवं दानयोग्य धनों द्वारा हमें बढ़ाओ. (४) सं यन्मही मिथती स्पर्धमाने तनूरूचा शूरसाता यतैते. अदेवयुं विदथे देवयुभिः सत्रा हतं सोमसुता जनेन.. (५) हे इंद्र एवं अग्नि! महान्, एकदूसरों का नाश करती हुई एकदूसरी को ललकारती हुई एवं युद्ध का प्रयत्न करती हुई शत्रुसेनाओं को अपने तेज द्वारा नष्ट करो. तुम सोमरस निचोड़ने वाले एवं देवों की अभिलाषा करने वाले यजमान की सहायता से देवों की कामना न करने वाले लोगों का नाश करो. (५) इमामु षु सोमसुतिमुप न इन्द्राग्नी सौमनसाय यातम्. नू चिद्धि परिमम्नाथे अस्माना वां शश्वद्भिर्ववृतीय वाजैः.. (६) इंद्र एवं अग्नि! मैत्रीभाव पाने के लिए हमारे इस सोमरस निचोड़ने के उत्सव में आओ. तुम हमारे अतिरिक्त किसी को भी मत जानो. वे केवल हमें ही जानते हैं, इसलिए हमें अधिक अन्न द्वारा बुलाते हैं. (६) सो अग्न एना नमसा समिद्धोऽच्छा मित्रं वरुणमिन्द्रं वोचेः. यत्सीमागाश्चकृमा तत्सु मृळ तदर्यमादितिः शिश्रथन्तु.. (७) हे अग्नि! तुम इस अन्न द्वारा प्रज्वलित होकर मित्र, इंद्र एवं वरुण से कहो कि वह मेरा भक्त है. हम लोगों से जो अपराध हुआ है, उससे हमारी रक्षा करो. अर्यमा तथा अदिति हमारे अपराध को हमसे दूर करें. (७) ebook converter DEMO Watermarks*
सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि
एता अग्न आशुषाणास इष्टीर्युवोः सचाभ्यश्याम वाजान्. मेन्द्रो नो विष्णुर्मरुतः परि ख्यन्युयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (८) हे अग्नि! शीघ्रतापूर्वक इस यज्ञ का सहारा लेते हुए हम एक साथ तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अन्न प्राप्त करें. इंद्र, विष्णु एवं मरुद्गण हमें त्यागकर दूसरे को न देखें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा सदा हमारी रक्षा करो. (८) सूक्त—९४ देवता—इंद्र व अग्नि इयं वामस्य मन्मन इन्द्राग्नी पूर्व्यस्तुतिः. अभ्राद्वृष्टिरिवाजनि.. (१) हे इंद्र एवं अग्नि! इस स्तोता से यह उत्तम स्तुति उसी प्रकार उत्पन्न हुई है, जिस प्रकार बादल से वर्षा होती है. (१) शृणुतं जरितुर्हवमिन्द्राग्नी वनतं गिरः. ईशाना पिप्यतं धियः.. (२) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम स्तोता की पुकार सुनो और उसकी स्तुति स्वीकार करो. तुम सबके स्वामी हो, इसलिए यज्ञकर्म को पूरा करो. (२) मा पापत्वाय नो नरेन्द्राग्नी माभिशस्तये. मा नो रीरधतं निदे.. (३) हे नेता इंद्र एवं अग्नि! हमें हीनभाव, पराजय एवं निंदा के वश में मत करना. (३) इन्द्रे अग्ना नमो बृहत्सुवृक्तिमेरयामहे. धिया धेना अवस्यवः.. (४) हम अपनी रक्षा की अभिलाषा से विस्तृत हव्यरूप अन्न, शोभनस्तुति एवं यज्ञकर्म- सहित-स्तुतिवचन इंद्र एवं अग्नि के पास भेजते हैं. (४) ता हि शश्वन्त ईळत इत्था विप्रास ऊतये. सबाधो वाजसातये.. (५) बुद्धिमान् लोग अपनी रक्षा के लिए इंद्र व अग्नि दोनों की इस प्रकार स्तुति करते हैं. समान कष्ट भोगने वाले लोग अन्न पाने के लिए स्तुति करते हैं. (५) ता वां गीर्भिर्विपन्यवः प्रयस्वन्तो हवामहे. मेधसाता सनिष्यवः.. (६) स्तुति करने के इच्छुक हव्य अन्न से युक्त एवं धन की अभिलाषा वाले हम यज्ञ का फल पाने के लिए स्तुति द्वारा उन दोनों को बुलाते हैं. (६) इन्द्राग्नी अवसा गतमस्मभ्यं चर्षणीसहा. मा नो दुःशंस ईशत.. (७) हे शत्रुओं को हराने वाले इंद्र एवं अग्नि! तुम अन्न लेकर हमारे पास आओ. बुरे वचन
बोलने वाला हमारा स्वामी न बने. (७) मा कस्य नो अररुषो धूर्तिः प्रणङ्मर्त्यस्य. इन्द्राग्नी शर्म यच्छतम्.. (८) हे इंद्र एवं अग्नि! हमें किसी भी मनुष्य द्वारा हिंसा प्राप्त न हो. हमें तुम सुख दो. (८) गोमद्धिरण्यवद्वसु यद्दामश्वावदीमहे. इन्द्राग्नी तद्द्वनेमहि.. (९) हे इंद्र एवं अग्नि! हम तुमसे जिन गायों, स्वर्ण एवं अश्वों से युक्त धन को मांगते हैं, उसका हम उपभोग करें. (९) यत्सोम आ सुते नर इन्द्राग्नी अजोहवुः. सप्तीवन्ता सपर्यवः.. (१०) सोमरस निचुड़ जाने पर यज्ञकर्म के नेता जनसेवा की अभिलाषा से उत्तम घोड़ों वाले इंद्र एवं अग्नि को बार-बार बुलाते हैं. (१०) उक्थेभिर्वृत्रहन्तमा या मन्दाना चिदा गिरा. आङ्गूषैराविवासतः.. (११) हम उक्थों, स्तुतियों एवं स्तोत्रों द्वारा शत्रुनाशकों में श्रेष्ठ एवं अतिशय प्रसन्न इंद्र एवं अग्नि की सेवा करते हैं. (११) ताविद्दुःशंसं मर्त्यं दुर्विद्वांसं रक्षस्विनम्. आभोगं हन्मना हतमुदधिं हन्मना हतम्.. (१२) हे इंद्र एवं अग्नि! तुम दुष्टविचारों एवं बुरे ज्ञान वाले, शक्तिशाली एवं हमारी संपत्ति का अपहरण करने वाले मनुष्य को आयुध द्वारा इस प्रकार नष्ट करो जैसे घड़ा फोड़ा जाता है. (१२) सूक्त—९५ देवता—सरस्वती प्र क्षोदसा धायसा सस्र एषा सरस्वती धरुणमायसी पूः. प्रबाबधाना रथ्येव याति विश्वा अपो महिना सिन्धुरन्याः.. (१) यह सरस्वती नदी लोहे के द्वारा बनी नगरी के समान सबको धारण करती हुई प्राणघातक जल के साथ बहती है. जिस प्रकार सारथि सबको पीछे छोड़कर आगे निकल जाता है, उसी प्रकार यह अपनी महिमा द्वारा सब जलपूर्ण नदियों को बाधा देकर आगे बढ़ती है. (१) एकाचेतत्सरस्वती नदीनां शुचिर्यती गिरिभ्य आ समुद्रात्. रायश्चेतन्ती भुवनस्य भूरेर्घृतं पयो दुदुहे नाहुषाय.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
सभी नदियों में पवित्र एवं पर्वत से निकलकर सागर तक जाने वाली सरस्वती नदी ने ही केवल राजा नहुष की प्रार्थना को समझा. सरस्वती ने नहुष को सारे संसार का पर्याप्त धन प्रदान करके दूध का दोहन किया था. (२) स वावृधे नर्यो योषणासु वृषा शिशुर्वृषभो यज्ञियासु. स वाजिनं मघवद्भ्यो दधाति वि सातये तन्वं मामृजीत.. (३) मानवों का हित एवं वर्षा करने वाले सरस्वन् नामक वायु यज्ञ के योग्य स्त्री अर्थात् जरासमूह के बीच वृद्धि को प्राप्त हुए. वे हव्य धारण करने वाले यजमानों को शक्तिशाली संतान देते हैं एवं उनके कल्याण के लिए शरीर का संस्कार करते हैं. (३) उत स्या नः सरस्वती जुषाणोप श्रवत् सुभगा यज्ञे अस्मिन्. मितज्ञुभिर्नमस्यैरियाना राया युजा चिदुत्तरा सखिभ्यः.. (४) शोभनधन वाली सरस्वती प्रसन्न होकर इस यज्ञ में हमारी स्तुति सुनें. घुटने टेककर समीप जाने वाले देवों से युक्त सरस्वती धन से नित्य संपन्न होकर अपने मित्रों के लिए क्रमशः दया वाली बनें. (४) इमा जुह्वाना युष्मदा नमोभिः प्रति स्तोमं सरस्वति जुषस्व. तव शर्मन्प्रियतमे दधाना उपस्थेयाम शरणं न वृक्षम्.. (५) हे सरस्वती! इस यज्ञ का हवन करते हुए हम लोग स्तुतियों द्वारा तुमसे धन प्राप्त करेंगे. तुम हमारी स्तुति स्वीकार करो. हम तुम्हारे सर्वाधिक प्रिय घर में रहते हुए तुम्हारे साथ इस प्रकार मिलेंगे, जिस प्रकार पक्षी अपने आश्रयस्थल वृक्ष से मिलते हैं. (५) अयमु ते सरस्वति वसिष्ठो द्वारावृतस्य सुभगे व्यावः. वर्ध शुभ्रे स्तुवते रासि वाजान् यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (६) हे शोभनधन वाली सरस्वती! यह वसिष्ठ तुम्हारे लिए यज्ञ के द्वार खोलता है. हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती देवी! तुम वृद्धि प्राप्त करो एवं स्तोता को अन्न दो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (६) सूक्त—९६ देवता—सरस्वती व सरस्वन् बृहदु गायिषे वचोऽसुर्या नदीनाम्. सरस्वतीमिन्महया सुवृक्तिभिः स्तोमैर्वसिष्ठ रोदसी.. (१) हे वसिष्ठ! तुम नदियों में सर्वाधिक शक्तिशालिनी सरस्वती के लिए स्तोत्र का गान करो एवं द्यावा-पृथिवी में स्थित सरस्वती की पूजा दोषहीन स्तोत्रों द्वारा करो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*
उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः. सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम्.. (२) हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती! तुम्हारी महिमा से मनुष्य दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार का अन्न प्राप्त करता है. तुम रक्षा वाली बनकर हमें जानो एवं मरुतों की सखी के रूप में हव्यदाताओं को धन प्रदान करो. (२) भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती. गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत्.. (३) कल्याण करने वाली सरस्वती हमारा कल्याण ही करें. शोभन गति वाली एवं अन्नस्वामिनी सरस्वती हम में बुद्धि उत्पन्न करें. मैं जमदग्नि के समान तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम वसिष्ठ अर्थात् मेरे उपर्युक्त स्तोत्र पाओ. (३) जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः. सरस्वन्तं हवामहे.. (४) पत्नी एवं पुत्र की कामना करने वाले एवं शोभन दानयुक्त हम स्तोता नामक देव की स्तुति करते हैं. (४) ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः. तेभिर्नोऽविता भव.. (५) हे सरस्वन् देव! तुम्हारा जो जलसमूह रसयुक्त एवं वर्षा करने वाला है, उसीसे हमारी रक्षा करो. (५) पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः. भक्षीमहि प्रजामिषम्.. (६) हम सबके दर्शनीय एवं बुद्धिशाली सरस्वन् देव के जलधारक स्तोत्र को पाकर बुद्धि एवं अन्न प्राप्त करें. (६) सूक्त—९७ देवता—इंद्र आदि यज्ञे दिवो नृषदने पृथिव्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति. इन्द्राय यत्र सवनानि सुन्वे गमन्मदाय प्रथमं वयश्च.. (१) जिस यज्ञ में देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् प्रसन्न होते हैं, जिस यज्ञ में धरती के नेता इंद्र के निमित्त हर बार सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र प्रसन्नता पाने के लिए उसी यज्ञ में स्वर्ग से सर्वप्रथम आवें एवं उनके घोड़े भी आवें. (१) आ दैव्या वृणीमहेऽवांसि बृहस्पतिर्नो मह आ सखायः. यथा भवेम मीळहुषे अनागा यो नो दाता परावतः पितेव.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*
हे मित्रो! हम अभिलाषापूरक बृहस्पति के प्रति इस प्रकार पापरहित बनें कि वे उसी प्रकार धन लाकर दें, जिस प्रकार पिता दूर देश से धन लाकर पुत्र को सौंपता है. (२) तमु ज्येष्ठं नमसा हविर्भिः सुशेवं ब्रह्मणस्पतिं गृणीषे. इन्द्रं श्लोको महि दैव्यः सिषक्तु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा.. (३) मैं अतिशय प्रसिद्ध एवं शोभन मुख वाले बृहस्पति की स्तुति नमस्कारों एवं हव्य अन्नों द्वारा करता हूं. देवों के योग्य हमारा मंत्र इंद्र की सेवा करे. इंद्र देवों द्वारा निर्मित स्तोत्रों के स्वामी हैं. (३) स आ नो योनिं सदतु प्रेष्ठो बृहस्पतिर्विश्ववारो यो अस्ति. कामो रायः सुवीर्यस्य तं दातपर्षन्नो अति सश्चतो अरिष्टान्.. (४) वे बृहस्पति हमारे यज्ञस्थान पर बैठें जो सबके द्वारा वरण करने योग्य हैं. वे हमारी धन एवं उत्तमबल से संबंधित अभिलाषा को पूरा करें. हम उपद्रवग्रस्तों को वे हिंसा से बचाकर शत्रुओं के पास पहुंचावें. (४) तमा नो अर्कममृताय जुष्टमिमे धासुरमृतासः पुराजाः. शुचिक्रन्दं यजतं पस्त्यानां बृहस्पतिमनर्वाणं हुवेम.. (५) सर्वप्रथम उत्पन्न हुए मरणरहित देवगण हमें पूजा का साधनरूप अन्न अधिक मात्रा में दें. पवित्र स्तुतियों वाले, गृहस्थों द्वारा यजनीय एवं पराभवरहित बृहस्पति को हम बुलाते हैं. (५) तं शग्मासो अरुषासो अश्वा बृहस्पतिं सहवाहो वहन्ति. सहश्चिद्यस्य नीलवत्सधस्थं नभो न रूपमरुषं वसानाः.. (६) सुखकर, तेजस्वी, मिलकर वहन करने वाले एवं सूर्य के समान प्रकाशयुक्त घोड़े प्रसिद्ध बृहस्पति को वहन करें. उनके पास शक्ति एवं निवास करने योग्य घर है. (६) स हि शुचिः शतपत्रः स शुन्ध्युर्हिरण्यवाशीरिषिरः स्वर्षाः. बृहस्पतिः स स्वावेश ऋष्वः पुरू सखिभ्य आसुतिं करिष्ठः.. (७) बृहस्पति पवित्र एवं विविध वाहनों वाले हैं. वे सबके शोधक हैं. वे हितकर एवं रमणीय वाणी बोलते हैं. वे गमनशील, स्वर्ग का भोग करने वाले, शोभन निवास वाले एवं दर्शनीय हैं. वे अपने स्तोताओं को श्रेष्ठ अन्न देते हैं. (७) देवी देवस्य रोदसी जनित्री बृहस्पतिं वावृधतुर्महित्वा. दक्षाय्याय दक्षता सखायः करद् ब्रह्मणे सुतरा सुगाधा.. (८) ebook converter DEMO Watermarks*
बृहस्पति देव को उत्पन्न करने वाली द्यावा-पृथिवीरूप देवी अपनी महिमा से उन्हें बढ़ावें. हे मित्रो! तुम भी बढ़ाने योग्य बृहस्पति को बढ़ाओ. उन्होंने अन्नवृद्धि के लिए सुख से तरण करने योग्य एवं स्नानक्षम जलों को बनाया है. (८) इयं वां ब्रह्मणस्पते सुवृक्तिर्ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे अकारि. अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (९) हे ब्रह्मणस्पति! मैंने यह शोभन वचनरूपी स्तुति तुम्हारे एवं वज्रधारी इंद्र के लिए बनाई है. तुम हमारे यज्ञों की रक्षा करो, अनेक स्तुतियां सुनो एवं हम भक्तों पर आक्रमण करने वाली शत्रुसेना का नाश करो. (९) बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य. धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्ध्यं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०) हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (१०) सूक्त—९८ देवता—इंद्र व बृहस्पति अध्वर्यवोऽरुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्. गौराद्भेदीयाँ अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१) हे अध्वर्यु लोगो! मानवों में श्रेष्ठ इंद्र के लिए रुचिकर एवं निचोड़े हुए सोमरस को भेंट करो. गौरमृग दूरस्थित जल को जानकर जिस तेजी से आता है, इंद्र पीने योग्य सोम का ज्ञान होने पर सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को खोजते हुए उससे भी तेजी से आते हैं. (१) यद्दधिषे प्रदिवि चार्वन्नं दिवेदिवे पीतिमदस्य वक्षि. उत हृदोत मनसा जुषाण उशन्निन्द्र प्रस्थितान् पाहि सोमान्.. (२) हे इंद्र! बीते हुए दिनों में जिस शोभन अन्नरूप सोम को तुम धारण करते थे, अब भी प्रतिदिन उसी सोम को पीने की अभिलाषा करो. हे इंद्र! तुम हृदय एवं मन से हमारे कल्याण की कामना करते हुए सम्मुख रखे सोम को पिओ. (२) जज्ञानः सोमं सहसे पपाथ प्र ते माता महिमानमुवाच. एन्द्र पप्राथोर्व१न्तरिक्षं युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (३) हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही बलप्राप्ति के लिए सोमरस पिया था. माता अदिति ने तुम्हारी महिमा का वर्णन किया. तुमने विस्तृत आकाश को अपने तेज से भर दिया था. तुमने युद्ध ebook converter DEMO Watermarks*
द्वारा देवों के लिए धन प्राप्त किया. (३) यद्योधया महतो मन्यमानान्त्साक्षाम तान् बाहुभिः शाशदानान्. यद्वा नृभिर्वृत इन्द्राभियुध्यास्तं त्वयाजिं सौश्रवसं जयेम.. (४) हे इंद्र! अपने आपको बड़ा मानने वाले योद्धाओं के साथ तुम जब हमारा युद्ध कराओगे, तब उन हिंसक शत्रुओं को हम हाथों से ही हरा देंगे. हे इंद्र! यदि मरुतों को साथ लेकर तुम स्वयं युद्ध करोगे, तो हम तुम्हारी सहायता से उस शोभन अन्नप्राप्ति वाले युद्ध में विजय पाएंगे. (४) प्रेन्द्रस्य वोचं प्रथमा कृतानि प्र नूतना मघवा या चकार. यदेददेवींरसहिष्ट माया अथाभवत्केवलः सोमो अस्य.. (५) मैं इंद्र के प्राचीन कार्यों का वर्णन करता हूं. इंद्र ने जो नए कार्य किए हैं, मैं उन्हें भी कहता हूं. इंद्र ने असुरों की मायाओं को पराजित किया है, इसलिए सोमरस केवल इंद्र के लिए ही है. (५) तवेदं विश्वमभितः पशव्यं१ यत्पश्यसि चक्षसा सूर्यस्य. गवामसि गोपतिरेक इन्द्र भक्षीमहि ते प्रयतस्य वस्वः.. (६) हे इंद्र! प्राणियों के लिए हितकारक विश्व चारों ओर स्थित है. उसे तुम सूर्य के प्रकाश की सहायता से देखते हो. यह विश्व तुम्हारा ही है. एकमात्र तुम्हीं गायों के स्वामी हो. हम तुम्हारे द्वारा दिया हुआ धन भोगते हैं. (६) बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य. धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (७) हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (७) सूक्त—९९ देवता—इंद्र व विष्णु परो मात्रया तन्वा वृधान न ते महित्वमन्वश्नुवन्ति. उभे ते विद्म रजसी पृथिव्या विष्णो देव त्वं परमस्य वित्से.. (१) हे विष्णु! शब्द, स्पर्श आदि पंचतन्मात्राओं से अतीत तुम्हारा शरीर जब वामन अवतार के समय बढ़ता है, तब तुम्हारी महिमा कोई नहीं जान सकता. हम तुम्हारे दो लोकों अर्थात् धरती एवं अंतरिक्ष को जानते हैं, पर परम लोक को तुम ही जानते हो. (१) ebook converter DEMO Watermarks*