भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1152, कुल 1855 में से

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बृहस्पति देव को उत्पन्न करने वाली द्यावा-पृथिवीरूप देवी अपनी महिमा से उन्हें बढ़ावें. हे मित्रो! तुम भी बढ़ाने योग्य बृहस्पति को बढ़ाओ. उन्होंने अन्नवृद्धि के लिए सुख से तरण करने योग्य एवं स्नानक्षम जलों को बनाया है. (८) इयं वां ब्रह्मणस्पते सुवृक्तिर्ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे अकारि. अविष्टं धियो जिगृतं पुरन्धीर्जस्तमर्यो वनुषामरातीः.. (९) हे ब्रह्मणस्पति! मैंने यह शोभन वचनरूपी स्तुति तुम्हारे एवं वज्रधारी इंद्र के लिए बनाई है. तुम हमारे यज्ञों की रक्षा करो, अनेक स्तुतियां सुनो एवं हम भक्तों पर आक्रमण करने वाली शत्रुसेना का नाश करो. (९) बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य. धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्ध्यं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (१०) हे बृहस्पति! तुम एवं इंद्र दोनों प्रकार के पार्थिव एवं दिव्य धन के स्वामी हो. इसलिए तुम स्तुतिकर्त्ता को धन देते हो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारा सदा पालन करो. (१०) सूक्त—९८ देवता—इंद्र व बृहस्पति अध्वर्यवोऽरुणं दुग्धमंशुं जुहोतन वृषभाय क्षितीनाम्. गौराद्भेदीयाँ अवपानमिन्द्रो विश्वाहेद्याति सुतसोममिच्छन्.. (१) हे अध्वर्यु लोगो! मानवों में श्रेष्ठ इंद्र के लिए रुचिकर एवं निचोड़े हुए सोमरस को भेंट करो. गौरमृग दूरस्थित जल को जानकर जिस तेजी से आता है, इंद्र पीने योग्य सोम का ज्ञान होने पर सोमरस निचोड़ने वाले यजमान को खोजते हुए उससे भी तेजी से आते हैं. (१) यद्दधिषे प्रदिवि चार्वन्नं दिवेदिवे पीतिमदस्य वक्षि. उत हृदोत मनसा जुषाण उशन्निन्द्र प्रस्थितान् पाहि सोमान्.. (२) हे इंद्र! बीते हुए दिनों में जिस शोभन अन्नरूप सोम को तुम धारण करते थे, अब भी प्रतिदिन उसी सोम को पीने की अभिलाषा करो. हे इंद्र! तुम हृदय एवं मन से हमारे कल्याण की कामना करते हुए सम्मुख रखे सोम को पिओ. (२) जज्ञानः सोमं सहसे पपाथ प्र ते माता महिमानमुवाच. एन्द्र पप्राथोर्व१न्तरिक्षं युधा देवेभ्यो वरिवश्चकर्थ.. (३) हे इंद्र! तुमने जन्म लेते ही बलप्राप्ति के लिए सोमरस पिया था. माता अदिति ने तुम्हारी महिमा का वर्णन किया. तुमने विस्तृत आकाश को अपने तेज से भर दिया था. तुमने युद्ध ebook converter DEMO Watermarks*