ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1137, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंउन में तुम सब शत्रुओं को आयुधों से दूर भगाओ एवं उनका नाश करो. (२) आपश्चिद्धि स्वयशसः सदःसु देवीरिन्द्रं वरुणं देवता धुः. कृष्टीरन्यो धारयति प्रविक्ता वृत्राण्यन्यो अप्रतीनि हन्ति.. (३) स्वाधीन यशवाले एवं द्योतमान समस्त सोम घरों में इंद्र एवं वरुण देव को धारण करते हैं. इन में एक प्रजाओं को विभक्त करके पालन करता है एवं दूसरा अपराजित शत्रुओं को मारता है. (३) स सुक्रतुर्ऋतचिदस्तु होता य आदित्य शवसा वां नमस्वान्. आवर्वतदवसे वां हविष्मान्सदित्स सुविताय प्रयस्वान्.. (४) हे शक्तिशाली एवं अदितिपुत्र मित्रावरुण! जो नमस्कार के द्वारा तुम्हारी सेवा करता है, वही होता शोभन कर्मवाला एवं यज्ञदाता हो. जो व्यक्ति हव्ययुक्त होकर तुम्हें बार-बार बुलाता है, वह यजमान अन्न का स्वामी होकर फल पाने वाला बने. (४) इयमिन्द्रं वरुणमष्ट मे गीः प्रावत्तोके तनये तूतुजाना. सुरत्नासो देववीतिं गमेम यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (५) मेरी यह स्तुति इंद्र एवं वरुण के पास पहुंचे. मेरी स्तुति पुत्र एवं पौत्र की रक्षा का कारण बने. हम शोभनरत्न वाले होकर यज्ञ प्राप्त करें. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (५) सूक्त—८६ देवता—वरुण धीरा त्वस्य महिना जनूंषि वि यस्तस्तम्भ रोदसी चिदुर्वी. प्र नाकमृष्वं नुनुदे बृहन्तं द्विता नक्षत्रं पप्रथच्च भूम.. (१) वरुण के जन्म उनकी महिमा से स्थिर होते हैं. वरुण ने विस्तृत द्यावा-पृथिवी को धारण किया है, महान् आकाश और दर्शनीय नक्षत्रों को दो बार प्रेरणा दी है तथा धरती को विशाल बनाया है. (१) उत स्वया तन्वा३ सं वदे तत्कदा न्व१न्तर्वरुणे भुवानि. किं मे हव्यमहृणानो जुषेत कदा मृळीकं सुमना अभि ख्यम्.. (२) क्या मैं अपने शरीर के साथ अथवा वरुण के साथ स्थिर रहूं? क्या मैं वरुण में अपना मन संलग्न करूं? वरुण क्रोध न करते हुए मेरे हव्य को क्यों स्वीकार करेंगे? मैं शोभनमन से सुंदर वरुण को कब देखूंगा. (२) पृच्छे तदेनो वरुण दिदृक्षूपो एमि चिकितुषो विपृच्छम्. ebook converter DEMO Watermarks*