ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1175, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंवाले हैं, वे ही इंद्र अपने यजमानों के अनुकूल बनते हैं. (३३) एष एतानि चकारेन्द्रो विश्वा योऽति शृण्वे. वाजदावा मघोनाम्.. (३४) सर्वत्र प्रसिद्ध एवं हव्य धारणकर्त्ताओं को अन्न देने वाले इंद्र ने ये सारे काम किए हैं. (३४) प्रभर्ता रथं गव्यन्तमपाकाच्चिद्यमवति. इनो वसु स हि वोळ्हा.. (३५) प्रहार करने वाले इंद्र जिस गतिशील एवं गाय की कामना करने वाले स्तोता को अपक्वबुद्धि वाले स्तोता के चक्कर से बचाते हैं, वह स्तोता धन का स्वामी बनकर हव्य वहन करता है. (३५) सनिता विप्रो अर्वद्भिर्हन्ता वृत्रं नृभिः शूरः. सत्योऽविता विधन्तम्.. (३६) बुद्धिमान् इंद्र घोड़ों की सहायता से इच्छित स्थान पर जाते हैं. शूर इंद्र नेता मरुतों की सहायता से वृत्र को मारते हैं. वे अपने यजमान के सच्चे रक्षक हैं. (३६) यजध्वैनं प्रियमेधा इन्द्रं सत्राचा मनसा. यो भूत्सोमैः सत्यमद्धा.. (३७) हे प्रियमैध ऋषि! इंद्र के प्रति श्रद्धा रख कर यज्ञ करो. सफल कृपा वाले इंद्र सोमरस पीकर प्रसन्न होते हैं. (३७) गाथश्रवसं सत्पतिं श्रवस्कामं पुरुत्मानम्. कणवासो गात वाजिनम्.. (३८) हे कण्वगोत्रीय ऋषियो! तुम गाने योग्य यश वाले, सज्जनों के पालक, अन्न के इच्छुक, अनेक प्रदेशों में जाने वाले एवं गतिशील इंद्र की स्तुति करो. (३८) य ऋते चिद्गास्पदेभ्यो दात् सखा नृभ्यः शचीवान्. ये अस्मिन्कामश्रियन्.. (३९) मित्र व शोभनकर्म वाले इंद्र ने गायों के पैरों के निशान न होने पर भी गाएं खोजकर देवों को दी थीं. देवों ने इंद्र के द्वारा अपनी अभिलाषा पूर्ण की. (३९) इत्था धीवन्तमद्रिवः काण्वं मेध्यातिथिम्. मेषो भूतोऽभि यन्नयः.. (४०) हे वज्रधारी इंद्र! तुमने बादल के रूप में गति करते हुए सामने जाकर कण्व के पुत्र मेधातिथि ऋषि को प्राप्त किया था. (४०) शिक्षा विभिन्दो अस्मै चत्वार्ययुता ददत्. अष्टा परः सहस्रा.. (४१) हे राजा विभिंदु! तुमने दाता बनकर मुझे चालीस हजार गाएं दी हैं. तुमने मुझे बाद में आठ हजार और दी हैं. (४१) ebook converter DEMO Watermarks*