भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1197, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1197

इन मरुतों के रथ को जिस समय सफेद बिंदुओं वाली हिरनियां खींचती हैं एवं रोहित- मृग वहन करता है, उस समय सुंदर मरुत् जाते हैं और जल बहता है. (२८) सुषोमे शर्यणावत्यार्जीके पस्त्यावति. ययुर्निचक्रया नर:.. (२९) नेता मरुद्गण ऋजीक देश में वर्तमान शर्यणावत स्थान के तालाब के पास बनी सोमरस युक्त यज्ञशाला में अपने रथ के पहिए नीचे की ओर करके जाते हैं. (२९) कदा गच्छाथ मरुत इत्था विप्रं हवमानम्. मार्डीकेभिर्नाधमानम्.. (३०) हे मरुतो! तुम इस प्रकार पुकारने वाले, याचना करते हुए एवं बुद्धिमान् स्तोता के पास सुख का कारण धन लेकर कब आओगे? (३०) कद्ध नूनं कधप्रियो यदिन्द्रमजहातन. को वः सखित्व ओहते.. (३१) हे स्तुति द्वारा प्रसन्न होने वाले मरुतो! तुमने इंद्र को कब छोड़ा? तुम्हारी मित्रता किसने चाही थी. (३१) सहो षु णो वज्रहस्तैः कणवासो अग्निं मरुद्भिः. स्तुषे हिरण्यवाशीभिः.. (३२) हे कण्वगोत्रीय ऋषियो! हाथ में वज्र धारण करने वाले एवं सोने के बने काठ खोदने के आयुध से युक्त मरुतों के साथ-साथ अग्नि की स्तुति करो. (३२) ओ षु वृष्णः प्रयज्यूना नव्यसे सुविताय. ववृत्यां चित्रावाजान्.. (३३) मैं अभिलाषापूरक, विशिष्ट रूप से यज्ञपात्र व विचित्र गति वाले मरुतों को भली प्रकार प्राप्त होने वाले नवीन धन के लिए दयालु बनाता हूं. (३३) गिरयश्चिन्नि जिहते पर्शानासो मन्यमानाः. पर्वताश्चिन्नि येमिरे.. (३४) मरुतों द्वारा पीड़ा एवं बाधा पहुंचाए जाने पर भी पर्वत अपने स्थान से हटते नहीं हैं. पर्वत स्थिर रहते हैं. (३४) आक्ष्णायावानो वहन्त्यन्तरिक्षेण पततः. धातारः स्तुवते वयः.. (३५) दूरदूर तक जाने वाले अश्व आकाश मार्ग से चलकर मरुतों को लाते हैं एवं स्तुति करने वाले को अन्न देते हैं. (३५) अग्निर्हि जानि पूर्व्यश्छन्दो न सूरो अर्चिषा. ते भानुभिर्वि तस्थिरे.. (३६) अग्नि ने अपने तेज से सर्वप्रमुख बनकर प्रशंसनीय सूर्य के समान जन्म लिया है. मरुद्गण अपनी दीप्तियों के द्वारा भिन्नभिन्न स्थानों में स्थित हैं. (३६) ebook converter DEMO Watermarks*