भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 1196

क्व नूनं सुदानवो मदथा वृक्तबर्हिषः. ब्रह्मा को वः सपर्यति.. (२०) हे शोभनदान वाले मरुतो! तुम्हारे लिए कुश उखाड़े गए हैं. तुम इस समय किस स्थान पर प्रसन्न हो? कौन स्तोता तुम्हारी सेवा कर रहा है? (२०) नहि ष्म यद्ध वः पुरा स्तोमेभिर्वृक्त बर्हिषः. शर्धाँ ऋतस्य जिन्वथ.. (२१) हे यज्ञ में संलग्न मरुतो! तुम हमारे स्तोत्र सुनने से पहले ही दूसरों की स्तुतियों से अपना यज्ञ संबंधी बल बढ़ाते हो, यह बात उचित नहीं है. (२१) समु त्ये महतीरपः सं क्षोणी समु सूर्यम्. सं वज्रं पर्वशो दधुः.. (२२) मरुतों ने विस्तृत ओषधियों में जलों का संयोग किया था, द्यावा-पृथिवी को यथास्थान अवस्थित किया था, सूर्य को अपने स्थान पर रखा एवं वृत्रों को टुकड़ेटुकड़े करने के लिए वज्र धारण किया. (२२) वि वृत्रं पर्वशो ययुर्वि पर्वताँ अराजिनः. चक्राणा वृष्णि पौंस्यम्.. (२३) स्वामीरहित एवं शक्तिशाली उत्साह का प्रदर्शन करते हुए मरुतों ने पर्वत के समान वृत्र के टुकड़ेटुकड़े कर दिए थे. (२३) अनु त्रितस्य युध्यतः शुष्ममावन्नत क्रतुम्. अन्विन्द्रं वृत्रतूर्ये.. (२४) मरुद्गण ने युद्ध करते हुए त्रित की शक्ति तथा यज्ञकर्म की रक्षा की थी. उन्होंने वृत्रहनन के समय इंद्र की रक्षा की थी. (२४) विद्युद्धस्ता अभिद्यवः शिप्राः शीर्षन्हिरण्मयीः. शुभ्रा व्यञ्जत श्रिये.. (२४) चमकते हुए आयुध हाथ में रखने वाले, दीप्तिशाली एवं शोभायुक्त मरुतों ने सुंदरता बढ़ाने के लिए अपने सिर पर टोप धारण किया. (२५) उशना यत्परावत उक्षणो रन्ध्रमायतन. द्यौर्न चक्रदद्विया.. (२६) हे मरुतो! तुम उशना ऋषि की स्तुति सुनकर अपने वर्षा करने वाले रथ द्वारा दूर स्थान से आए थे. उस समय धरती डर से द्युलोक के समान कांपने लगी थी. (२६) आ नो मखस्य दावनेऽश्वैर्हिरण्यपाणिभिः. देवास उप गन्तन.. (२७) मरुत् देव हमारे यज्ञ का फल देने के लिए सोने के पैरों वाले घोड़ों की सहायता से आए थे. (२७) यदेषां पृषती रथे प्रष्टिर्वहति रोहितः. यान्ति शुभ्रा रिणन्नपः.. (२८) ebook converter DEMO Watermarks*