ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1195, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंमरुतो यद्ध वो दिवः सुम्नयन्तो हवामहे. आ तू न उप गन्तन.. (११) हे मरुतो! अपने सुख की इच्छा करते हुए हम तुम्हें स्वर्ग से जिस समय बुलाते हैं, उस समय हमारे पास जल्दी आओ. (११) यूयं हि ष्ठा सुदानवो रुद्रा ऋभुक्षणो दमे. उत प्रचेतसो मदे.. (१२) हे शोभनदान वाले, रुद्रपुत्र एवं महान् मरुतो! तुम यज्ञशाला में नशीला सोमरस पीकर शोभनज्ञान वाले बन जाते हो. (१२) आ नो रयिं मदच्युतं पुरुक्षुं विश्वधायसम्. इयर्ता मरुतो दिवः.. (१३) हे शुभ्र मरुतो! हमारे लिए स्वर्ग से नशा टपकाने वाला, बहुत से लोगों द्वारा प्रशंसित एवं सबका भरण करने वाला अन्न लाओ. (१३) अधीव यद् गिरीणां यामं शुभ्रा अचिध्वम्. सुवानैर्मन्दध्व इन्दुभिः.. (१४) हे शुभ्र मरुतो! जब तुम पहाड़ के ऊपर अपना रथ ले जाते हो, तब तुम निचोड़े हुए सोमरस के कारण मतवाले होते हो. (१४) एतावतश्चिश्चिदेषां सुम्नं भिक्षेत मर्त्यः. अदाभ्यस्य मन्मभिः.. (१५) स्तोता अपने स्तोत्रों द्वारा अपराजेय मरुतों से अपना सुख मांगता है. (१५) ये द्रप्साइव रोदसी धमन्त्यनु वृष्टिभिः. उत्सं दुहन्तो अक्षितम्.. (१६) मरुद्गण संपूर्ण मेघ को दुहते हैं और पानी की बूंदों के समान वर्षा के द्वारा द्यावा- पृथिवी को ठीक से घेर लेते हैं. (१६) उदु स्वानेभिरीरत उद्रथैरुदु वायुभिः. उत्स्तोमैः पृश्निमातरः.. (१७) पृश्नि के पुत्र मरुत् शब्द करते हुए अपने रथों, हवाओं एवं मंत्रों द्वारा ऊपर जाते हैं. (१७) येनाव तुर्वशं यदुं येन कण्वं धनस्पृतम्. राये सु तस्य धीमहि.. (१८) हे मरुतो! जिस साधन से तुमने तुर्वश एवं यदु की रक्षा की थी तथा धन चाहने वाले कण्व की रक्षा की थी, हम धन पाने के लिए उसी रक्षासाधन का ध्यान करते हैं. (१८) इमा उ वः सुदानवो घृतं न पिप्युषीरिषः. वर्धन्काण्वस्य मन्मभिः.. (१९) हे शोभन दान वाले मरुतो! घी की तरह शरीर को पुष्ट करने वाले इस अन्न की वृद्धि कण्व की स्तुतियों की भांति करो. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*