भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1206, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1206

स त्वमस्मदप द्विषो युयोधि जातवेदः. अदेवीरणे अरातीः.. (३) हे जातवेद अग्नि! तुम हमारे शत्रुओं को हमसे अलग करो. हे अग्नि! देवों से द्वेष रखने वाले शत्रुसेनाओं को तुम अलग करो. (३) अन्ति चित्सन्तमह यज्ञं मर्तस्य रिपोः. नोप वेषि जातवेदः.. (४) हे जातवेद अग्नि! तुम शत्रु के पास रहकर भी कभी उसके यज्ञ की इच्छा नहीं करते. (४) मर्ता अमर्त्यस्य ते भूरि नाम मनामहे. विप्रासो जातवेदसः.. (५) हम मरणधर्मा ब्राह्मण तुझ मरणरहित अग्नि की विशाल स्तुतियां करेंगे. (५) विप्रं विप्रासोऽवसे देवं मर्तास ऊतये. अग्निं गीर्भिर्हवामहे.. (६) हम मरणधर्मा ब्राह्मण मेधावी अग्नि देव को अपनी रक्षा की दृष्टि से स्तुतियों द्वारा बुलाते हैं और हव्य द्वारा उन्हें प्रसन्न करते हैं. (६) आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वांकामया गिरा.. (७) हे अग्नि! वत्सगोत्रीय ऋषि तुम्हारे उत्तम निवास स्थान से तुम्हें बुला लेते हैं. वे अपनी स्तुति द्वारा हमारी कामना करते हैं. (७) पुरुत्रा हि सदृङ्ङसि विशो विश्वा अनु प्रभुः. समत्सु त्वा हवामहे.. (८) हे अग्नि! तुम बहुत से स्थानों को समानरूप से देखते हो. इसलिए तुम सारी प्रजाओं के मालिक हो. हम तुम्हें युद्ध में बुलाते हैं. (८) समत्स्वग्निमवसे वाजयन्तो हवामहे. वाजेषु चित्रराधसम्.. (९) हम अन्न की अभिलाषा से युद्ध में अपनी रक्षा करने के लिए अग्नि को बुलाते हैं. युद्ध में अग्नि विचित्र धन वाले हैं. (९) प्रत्नो हि कमीड्यो अध्वरेषु सनाच्च होता नव्यश्च सत्सि. स्वां चाग्ने तन्वं पिप्रयस्वास्मभ्यं च सौभगमा यजस्व.. (१०) हे अग्नि! तुम यज्ञ में पूज्य, प्राचीन, बहुत समय से हवन करने वाले, स्तुति के योग्य एवं यज्ञ में स्थित रहने वाले हो. तुम अपना शरीर हवि से प्रसन्न करो और हमें सौभाग्य दो. (१०) सूक्त—१२ देवता—इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

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