ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1207, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंय इन्द्र सोमपातमो मदः शविष्ठ चेतति. येना हंसि न्य१त्रिणं तमीमहे.. (१) हे सोमरस पीने वालों में श्रेष्ठ एवं अतिशय बलशाली इंद्र! तुम प्रसन्न होकर अपने कर्त्तव्य जानते हो. हम तुम्हारी उस प्रसन्नता की याचना करते हैं, जिसके कारण तुम राक्षसों को मारते हो. (१) येना दशग्वमधिगुं वेपयन्तं स्वर्णरम्. येना समुद्रमाविथा तमीमहे.. (२) हे इंद्र! हम तुमसे उसी मदपूर्ण स्थिति में आने की याचना करते हैं, जिसके कारण तुमने अंगिरागोत्रीय, अंधकार नाश करने वाले सूर्य एवं समुद्र की रक्षा की थी. (२) येन सिन्धुं महीरपो रथाँ इव प्रचोदयः. पन्थामृतस्य यातवे तमीमहे.. (३) हे इंद्र! जिस मद के कारण तुम विशाल जलों का रथ के समान सागर की ओर भेजते हो, हम यज्ञ के मार्ग पर चलने के लिए तुमसे उसी मद की दशा में होने की याचना करते हैं. (३) इमं स्तोममभिष्टये घृतं न पूतमद्रिवः. येना नु सद्य ओजसा ववक्षिथ.. (४) हे वज्रधारी इंद्र! हमें मनचाहा फल देने के लिए घृत के समान पवित्र हमारे उस स्तोत्र को जानो, जिसे सुनकर तुम तुरंत अपने बल से हमारी अभिलाषा पूरी करते हो. (४) इमं जुषस्व गिर्वणः समुद्र इव पिन्वते. इन्द्र विश्वाभिरूतिभिर्ववक्षिथ.. (५) हे स्तुतियां सुनने वाले इंद्र! हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. यह चंद्रोदय के समय बढ़ने वाले सागर के समान बढ़ता है. तुम उसी स्तोत्र के कारण हमें समस्त रक्षासाधनों द्वारा कल्याण देते हो. (५) यो नो देवः परावतः सखित्वनाय मामहे. दिवो न वृष्टिं प्रथयन्ववक्षिथ.. (६) हे इंद्र देव! तुमने दूर देश से आकर हमारी मैत्रीभावना बढ़ाने के लिए हमें धन दिया है. तुम हमारा धन अंतरिक्ष से होने वाली वर्षा के समान बढ़ाओ एवं हमें कल्याण देने की इच्छा करो. (६) ववक्षुरस्य केतव उत वज्रो गभस्त्योः यत्सूर्यो न रोदसी अवर्धयत्.. (७) इंद्र जब सूर्य के समान द्यावा-पृथिवी को वर्षा द्वारा बढ़ाते हैं, तब इंद्र के रथ पर लगे झंडे एवं उनका वज्र हमें अनेक कल्याण देते हैं. (७) यदि प्रवृद्ध सत्पते सहस्रं महिषाँ अधः. आदित्त इन्द्रियं महि प्र वावृधे.. (८) हे अतिशय महान् एवं सज्जनों के पालक इंद्र! जिस समय तुमने हजारों महान् राक्षसों ebook converter DEMO Watermarks*