ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1208, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंको मारा था, उसके बाद ही तुम्हारा बल महान् रूप से बढ़ा था. (८) इन्द्रः सूर्यस्य रश्मिभिर्न्यर्शानमोषति. अग्निर्वनेव सासहिः प्र वावृधे.. (९) जिस प्रकार अग्नि वनों को जलाते हैं, उसी प्रकार इंद्र सूर्य की किरणों द्वारा बाधक राक्षसों को ठीक से जलाते हैं एवं शत्रुओं को पराजित करते हुए बढ़ते हैं. (९) इयं त ऋत्वियावती धीतिरेति नवीयसी. सपर्यन्ती पुरुप्रिया मिमीतः इत्.. (१०) हे इंद्र! विभिन्न ऋतुओं में होने वाले यज्ञकर्मों से युक्त, अतिशय नवीन, आदर करती हुई एवं अधिक प्रसन्नताकारक यह स्तुति तुम्हारे पास जाती है. (१०) गर्भो यज्ञस्य देवयुः क्रतुं पुनीत आनुषक्. स्तोमैरिन्द्रस्य वावृधे मिमीतः इत्.. (११) यज्ञ करने वाला स्तोता इंद्र को दयालु करने की अभिलाषा से दशापवित्र द्वारा इंद्र के पान हेतु सोमरस को पुनीत करता है, स्तोत्रों द्वारा इंद्र को बढ़ाता है एवं स्तोत्रों द्वारा इंद्र के गुणों को सीमित करता है. (११) सनिर्मित्रस्य पप्रथ इन्द्रः सोमस्य पीतये. प्राची वाशीव सुन्वते मिमीतः इत्.. (१२) मित्र स्तोता को धन देने वाले इंद्र ने सोमरस पीने के लिए अपना शरीर उसी प्रकार बढ़ा लिया है, जिस प्रकार सोमरस निचोड़ने वाला यजमान अपने स्तुतिवचन का विस्तार करता है एवं इंद्र के गुणों की सीमा बांधता है. (१२) यं विप्रा उक्थवाहसोऽभिप्रमन्दुरायवः घृतं न पिप्य आसन्मृतस्य यत्.. (१३) मेधावी एवं स्तोत्र वहन करने वाले मनुष्य जिन इंद्र को भली प्रकार प्रमुदित करते हैं, उन्हीं इंद्र के मुख में मैं घृत के समान हव्य डालूंगा. (१३) उत स्वराजे अदितिः स्तोममिन्द्राय जीजनत्. पुरुप्रशस्तमूतय ऋतस्य यत्.. (१४) अदिति ने अपनी रक्षा के विचार से स्वयं प्रदीप्त के लिए बहुतों द्वारा प्रशंसित एवं यज्ञ संबंधी स्तोत्र उत्पन्न किया था. (१४) अधि वह्नय ऊतयेऽनूषत प्रशस्तये. न देव विव्रता हरी ऋतस्य यत्.. (१५) ऋत्विज् रक्षा एवं प्रशंसा पाने के लिए इंद्र की स्तुति करते हैं. हे इंद्र देव! इस समय विविध कर्म करने वाले घोड़े तुम्हें यज्ञ के लिए ढोते हैं. (१५) यत्सोममिन्द्र विष्णवि यद्वा घ त्रित आप्त्ये. यद्वा मरुत्सु मन्दसे समिन्दुभिः.. (१६) हे इंद्र! यद्यपि तुम विष्णु के आने पर सोमरस पीते हो अथवा जलपुत्र त्रित राजर्षि के ebook converter DEMO Watermarks*