भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1212, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1212

क्रीळन्त्यस्य सूनृता आपो न प्रवता यतीः. अया धिया य उच्यते पतिर्दिवः.. (८) इंद्र की सच्ची बातें नीचे की ओर बहने वाली जलधारा के समान विहार करती हैं. हमारी इस स्तुति द्वारा स्वर्ग के स्वामी की प्रशंसा होती है. (८) उतो पतिर्य उच्यते कृष्टीनामेक इद्वशी. नमोवृधैरवस्युभिः सुते रण.. (९) वश में करने वाले एकमात्र इंद्र ही मनुष्यों का पालन करने वाले कहे गए हैं. हे इंद्र! तुम स्तुतियों द्वारा बढ़ने वालों एवं रक्षा के इच्छुक लोगों के साथ सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (९) स्तुहि श्रुतं विपश्चितं हरी यस्य प्रसक्षिणा. गन्तारा दाशुषो गृहं नमस्विनः.. (१०) हे स्तोता! विद्वान् एवं प्रसिद्ध इंद्र की स्तुति करो. उनके दोनों शत्रुविजयी घोड़े हव्यदाता यजमान के घर जाने वाले हैं. (१०) तूतुजानो महेमतेऽश्वेभिः पृषितप्सुभिः. आ याहि यज्ञमाशुभिः शमिद्धि ते.. (११) हे महाफल देने वाली बुद्धि से युक्त इंद्र! तुम शीघ्र चलने वाले एवं चिकने घोड़े के साथ यज्ञ में आओ. उस यज्ञ में तुम्हें सुख मिलता है. (११) इन्द्र शविष्ठ सत्पते रयिं गृणत्सु धारय. श्रवः सूरिभ्यो अमृतं वसुत्वनम्.. (१२) हे शक्तिशालियों में श्रेष्ठ एवं सज्जनों के पालक इंद्र! हम स्तुति करने वालों को धन दो एवं स्तोताओं को मरणरहित तथा व्यापक यश दो. (१२) हवे त्वा सूर उदिते हवे मध्यन्दिने दिवः. जुषाण इन्द्र सप्तिभिर्न आ गहि.. (१३) हे इंद्र! मैं तुम्हें सूर्य निकलने पर एवं दोपहर के समय बुलाता हूं. तुम प्रसन्न होकर अपने तेज चलने वाले घोड़ों के द्वारा आओ. (१३) आ तू गहि प्र तु द्रव मत्स्वा सुतस्य गोमतः. तन्तुं तनुष्व पूर्व्य यथा विदे.. (१४) हे इंद्र! शीघ्र आओ एवं यज्ञ में जाओ. वहां गाय के दूध से मिले हुए सोमरस से प्रसन्न बनो. तुम पूर्वजों द्वारा किए हुए यज्ञ को उसी प्रकार बढ़ाओ, जिस प्रकार मैं जानता हूं. (१४) यच्छक्रासि परावति यदर्वावति वृत्रहन्. यद्वा समुद्रे अन्धसोऽवितेदसि.. (१५) हे शक्तिशाली एवं वृत्रहंता इंद्र! तुम चाहे दूरवर्ती स्थान में होओ, चाहे समीपवर्ती स्थान में होओ, चाहे सागर में होओ, सब स्थानों से आओ एवं सोमरस पीकर प्रसन्न बनो. (१५) इन्द्रं वर्धन्तु नो गिर इन्द्रं सुतास इन्दवः. इन्द्रे हविष्मतीर्विशो अराणिषुः.. (१६) हमारी स्तुतियां एवं निचोड़े हुए सोमरस इंद्र को बढ़ावें. हव्य धारण करने वाली प्रजाएं ebook converter DEMO Watermarks*

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