भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1213, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1213

इंद्र के प्रति श्रद्धा रखती हैं. (१६) तमिद्धिप्रा अवस्यवः प्रवत्वतीभिरूतिभिः. इन्द्रं क्षोणीरवर्धयन्वया इव.. (१७) बुद्धिमान् एवं रक्षा चाहने वाले स्तोता इंद्र को तृप्त करने वाली स्तुतियों द्वारा बढ़ाते हैं. सब लोक वृक्ष की शाखाओं के समान इंद्र के अधीन होकर उन्हें बढ़ाते हैं. (१७) त्रिकद्रुकेषु चेतनं देवासो यज्ञमतनत. तमिद्वर्धन्तु नो गिरः सदावृधम्.. (१८) देवों ने त्रिकद्रुक नाम के यज्ञ में चैतन्य करने वाले इंद्र को यज्ञ के योग्य बनाया था. सदा बढ़ने वाले इंद्र को हमारी स्तुतियां बढ़ावें. (१८) स्तोता यत्ते अनुव्रत उक्थान्यृतुथा दधे. शुचिः पावक उच्यते सो अद्भुत:.. (१९) हे इंद्र! तुम्हारा स्तोता प्रत्येक ऋतु के अनुसार अनुकूल कर्म करता हुआ उक्थों को बोलता है. शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं आश्चर्यजनक तुम स्तुति का विषय बनते हो. (१९) तदिद्रुद्रस्य चेतति यह्वं प्रत्नेषु धामसु. मनो यत्रा वि तद्दधुर्विचेतसः.. (२०) वे ही रुद्रपुत्र मरुत् अपने पुराने स्थानों में वर्तमान हैं, जिनकी स्तुति विशेष ज्ञान वाले स्तोता करते हैं. (२०) यदि मे सख्यामावर इमस्य पाह्यन्धसः. येन विश्वा अति द्विषो अतारिम.. (२१) हे इंद्र! यदि तुम मुझे अपनी मित्रता दो एवं इस सोमरस को पिओ, मैं सभी शत्रुओं को हरा सकता हूं. (२१) कदा त इन्द्र गिर्वणः स्तोता भवाति शन्तमः. कदा नो गव्ये अश्व्ये वसौ दधः.. (२२) हे स्तुतियां स्वीकार करने वाले इंद्र! तुम्हारा स्तोता कब अतिशय सुखी होगा? तुम हमें कब गायों एवं अश्वों वाले घर में रखोगे. (२२) उत ते सुष्टुता हरी वृषणा वहतो रथम्. अजुर्यस्य मदिन्तमं यमीमहे.. (२३) हे जरारहित इंद्र! तुम्हारे भली प्रकार स्तुत एवं अभिलाषापूरक घोड़े तुम्हारे रथ को यहां लावें. हे अतिशय प्रसन्न इंद्र! हम तुमसे याचना करते हैं. (२३) तमीमहे पुरुष्टुतं यह्वं प्रत्नाभिरूतिभिः. नि बर्हिषि प्रिये सददध द्विता.. (२४) महान् एवं बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र से हम प्राचीन सोमाहुतियों द्वारा याचना करते हैं. वे प्रिय कुश पर बैठें एवं दो प्रकार का हव्य स्वीकार करें. (२४) वर्धस्वा सु पुरुष्टुत ऋषिष्टुताभिरूतिभिः. धुक्षस्व पिप्युषीमिषमवा च नः.. (२५) ebook converter DEMO Watermarks*