ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1214, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे बहुतों द्वारा स्तुत इंद्र! तुम ऋषियों द्वारा प्रशंसित अपने रक्षासाधनों द्वारा हमें बढ़ाओ एवं हमें उन्नतिशील अन्न दो. (२५) इन्द्र त्वमवितेदसीत्था स्तुवतो अद्रिवः. ऋतादियर्मि ते धियं मनोयुजम्.. (२६) हे वज्रधारणकर्त्ता इंद्र! तुम सब प्रकार स्तोता की रक्षा करते हो. तुम्हारे सच्चे स्तोत्र के द्वारा मैं तुम्हारी दया प्राप्त करता हूं. (२६) इह त्या सधमाद्या युजानः सोमपीतये. हरी इन्द्र प्रतद्वसू अभि स्वर.. (२७) हे इंद्र! तुम अपने प्रसिद्ध, सम्मिलित रूप से प्रसन्न एवं विस्तृत धन वाले घोड़ों को रथ में जोड़ कर इस यज्ञ में सोमरस पीने के लिए आओ. (२७) अभि स्वरन्तु ये तव रुद्रासः सक्षत श्रियम्. उतो मरुत्वतीर्विशो अभि प्रयः..(२८) हे इंद्र! तुम्हारे अनुचर रुद्रपुत्र मरुद्गण इस आश्रययोग्य यज्ञ में प्राप्त हों एवं मरुतों से युक्त प्रजाएं भी हमारे हव्य को प्राप्त करें. (२८) इमा अस्य प्रतूर्तयः पदं जुषन्त यद्दिवि. नाभा यज्ञस्य सं दधुर्यथा विदे.. (२९) इंद्र की ये मरुत्रूपी प्रजाएं शत्रुओं का नाश करती हुई अपने आश्रयस्थल स्वर्गलोक की सेवा करती हैं एवं यज्ञ की नाभिरूपिणी उत्तरवेदी पर इस प्रकार स्थित रहती हैं कि हम धन पा सकें. (२९) अयं दीर्घाय चक्षसे प्राचि प्रयत्यध्वरे. मिमीते यज्ञमानुषग्विचक्ष्य.. (३०) इंद्र प्राचीन यज्ञशाला में यज्ञ आरंभ होने पर उसे पूर्वापररूप से देखकर इस प्रकार पूर्ण करते हैं, जिससे देखने योग्य फल मिल सके. (३०) वृषायमिन्द्र ते रथ उतो ते वृषणा हरी. वृषा त्वं शतक्रतो वृषा हवः.. (३१) हे इंद्र! तुम्हारा यह रथ अभिलाषापूरक है तथा तुम्हारे घोड़े की कामना पूरी करने वाले हैं. हे शतक्रतु इंद्र! तुम एवं तुम्हारे आह्वान दोनों ही अभिलाषापूरक हों. (३१) वृषा ग्रावा वृषा मदो वृषा सोमो अयं सुतः. वृषा यज्ञो यमिन्वसि वृषा हवः.. (३२) हे इंद्र! सोमलता कूटने वाले पत्थर, सोमरस का नशा व निचोड़ा हुआ सोम अभिलाषापूरक हैं. जिस यज्ञ में तुम प्राप्त होते हो, वह कामना पूरी करने वाला है. तुम्हारा आह्वान इच्छापूरक है. (३२) वृषा त्वा वृषणं हुवे वज्रिञ्चित्राभिरूतिभिः. वावन्थ हि प्रतिष्टुतिं वृषा हवः.. (३३)