भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1224, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 1224

सजातीय बनकर हम सदा तुम्हारे भक्त रहेंगे. (१९) बृहद्वरूथं मरुतां देवं त्रातारमश्विना. मित्रमीमहे वरुणं स्वस्तये.. (२०) हम भक्तों के रक्षक इंद्र, अश्विनीकुमारों, मित्र एवं वरुण से सुदृढ़ तथा शीतातप वारण करने वाला घर अपनी रक्षा के लिए मांगते हैं. (२०) अनेहो मित्रार्यमन्नृवद्वरुण शंस्यम्. त्रिवरूथं मरुतो यन्त नश्छर्दिः.. (२१) हे मित्र, अर्यमा, वरुण एवं मरुद्गण! तुम हमें ऐसा घर दो जो हिंसाशून्य, पुत्रादि से युक्त, प्रशंसा योग्य व शीत, आतप, वर्षा—तीनों का निवारक हो. (२१) ये चिद्धि मृत्युबन्धव आदित्या मनवः स्मसि. प्र सू न आयुर्जीवसे तिरेतन.. (२२) हे आदित्यो! जो लोग मृत्यु के बहुत समीप हैं, उनके जीवन के लिए उनकी आयु बढ़ाओ. (२२) सूक्त—१९ देवता—अग्नि आदि तं गूर्धया स्वर्णीरं देवासो देवमरतिं दधन्विरे. देवत्रा हव्यमोहिरे.. (१) हे स्तोताओ! सबके नेता प्रसिद्ध अग्नि की स्तुति करो. ऋत्विज् सबके स्वामी अग्नि देव के समीप जाते हैं एवं देवों को हव्य देते हैं. (१) विभूतरातिं विप्र चित्रशोचिषमग्निमीळिष्व यन्तुरम्. अस्य मेधस्य सोम्यस्य सोभरे प्रेमध्वराय पूर्व्यम्.. (२) हे मेधावी सौभरि! अधिक देने वाले, विचित्र-दीप्तिसंपन्न इस सोमसाध्य यज्ञ के नियंता एवं पुरातन अग्नि की स्तुति यज्ञपूर्ति के लिए करो. (२) यजिष्ठं त्वा ववृमहे देवं देवत्रा होतारममर्त्यम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्..(३) हे अतिशय-यज्ञपात्र, देवों में सर्वोत्तम देवों को बुलाने वाले, मरणरहित एवं इस यज्ञ के शोभनकर्त्ता अग्नि! हम तुम्हें बुलाते हैं. (३) ऊर्जो नपातं सुभगं सुदीदितिमग्निं श्रेष्ठशोचिषम्. स नो मित्रस्य वरुणस्य सो अपामा सुम्नं यक्षते दिवि.. (४) अन्न का पालन करने वाले शोभन धनयुक्त, उत्तम दीप्तिसंपन्न एवं श्रेष्ठ प्रकाश वाले अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. वे हमारे लिए द्युलोक में मित्र एवं वरुण के सुख का विचार करके तथा जल देवता के सुख के लिए यज्ञ करें. (४) ebook converter DEMO Watermarks*