भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 1223, कुल 1855 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1223

युयोता शरुमस्मदाँ आदित्यास उतामतिम्. ऋधग् द्वेषः कृणुत विश्ववेदसः.. (११) हे आदित्यो! हिंसक शत्रु एवं दुष्ट-बुद्धि को हमसे दूर करो. हे सर्वज्ञ आदित्यो! शत्रुओं को हमसे अलग करो. (११) तत्सु नः शर्म यच्छतादित्या यन्मुमोचति. एनस्वन्तं चिदेनसः सुदानवः.. (१२) हे शोभनदान वाले आदित्यो! तुम्हारा जो सुख पापी स्तोता को भी पाप से छुड़ाता है, उसे हमें दो. (१२) यो नः कश्चिद्रिरिक्षति रक्षस्त्वेन मर्त्यः. स्वैः ष एवै रिरिषीष्ट युर्जनः.. (१३) जो मनुष्य हमें राक्षस बनकर नष्ट करना चाहता है, वह अपने ही पापों से नष्ट हो जावे तथा अपने आप दूर चला जावे. (१३) समित्तमघमश्ववद्दुःशंसं मर्त्यं रिपुम्. यो अस्मत्रा दुर्हणावाँ उप द्वयुः.. (१४) उस अपकीर्ति वाले शत्रु-मनुष्य को पाप व्याप्त करे जो दुष्टतापूर्वक हमें मारना चाहता है एवं हमारे आगेपीछे दो प्रकार का व्यवहार करता है. (१४) पाकत्रा स्थन देवा हृत्सु जानीथ मर्त्यम्. उप द्वयुं चाद्वयुं च वसवः.. (१५) हे निवासस्थानदाता आदित्य देवो! तुम परिपक्व ज्ञान वाले हो. तुम अपने मन में कपटी और कपटहीन—दोनों प्रकार के लोगों को जानते हो. (१५) आ शर्म पर्वतानामोतापां वृणीमहे. द्यावाक्षामारे अस्मद्रपस्कृतम्.. (१६) हम अभिमुख होकर पर्वतसंबंधी एवं जलसंबंधी सुखों का वरण करते हैं. द्यावा-पृथिवी पाप को हमसे दूर ले जावें. (१६) ते नो भद्रेण शर्मणा युष्माकं नावा वसवः. अति विश्वानि दुरिता पिपर्तन.. (१७) हे निवासदाता आदित्यो! अपनी कल्याणकारी एवं सुखद नाव के द्वारा हमें सब पापों के पार पहुंचाओ. (१७) तुचे तनाय तत्सु नो द्राघीय आयुर्जीवसे. आदित्यासः सुमहसः कृणोतन.. (१८) हे शोभन-तेज वाले आदित्यो! हमारे पुत्रों और पौत्रों को एवं हमारे जीवन को बहुत लंबी आयु दो. (१८) यज्ञो हीळो वो अन्तर आदित्या अस्ति मृळत. युष्मे इद्धो अपि ष्मसि सजात्ये.. (१९) हे आदित्यो! हमारा यज्ञ तुम्हारे समीप ही वर्तमान है. तुम हमें सुखी करो. तुम्हारे ebook converter DEMO Watermarks*