ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 1226, कुल 1855 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे बल से युक्त एवं निवासस्थान देने वाले अग्नि! बुद्धिमान् स्तोता के हव्यदान में यज्ञकर्त्ता का वचन देवों के नीचे एवं मानवों के ऊपर करो. (१२) यो अग्निं हव्यदातिभिर्नमोभिर्वा सुदक्षमाविवासति. गिरा वाजिरशोचिषम्.. (१३) जो यजमान हव्य देकर एवं नमस्कारों द्वारा शोभन बलयुक्त अग्नि उपासना करता है अथवा स्तुतियों द्वारा गतिशील तेज वाले अग्नि की सेवा करता है वह समृद्धिशाली बनता है. (१३) समिधा यो निशिती दाशददितिं धामभिरस्य मर्त्यः. विश्वेत्स धीभिः सुभगो जनाँ अति द्युम्नैरुरुदन इव तारिषत्.. (१४) जो मनुष्य इस अग्नि के आकार से अविभाज्य गार्हपत्यादि की ज्वलनशील समिधाओं के द्वारा सेवा करता है, वह अपने यज्ञकर्मों द्वारा शोभन संपत्ति वाला बनकर तेजस्वी यशों द्वारा सब मनुष्यों को इस प्रकार पार कर जाता है जैसे जल सब बाधाएं पार करके आगे बढ़ता है. (१४) तदग्ने द्युम्नमा भर यत्सासहत्सदने कं चिदत्रिणम्. मन्युं जनस्य दूढ्यः.. (१५) हे अग्नि! हमें वह धन दो जो घर में वर्तमान राक्षस आदि को पराजित करता है एवं पापबुद्धि मनुष्य के क्रोध को दबाता है. (१५) येन चष्टे वरुणो मित्रो अर्यमा येन नासत्या भगः. वयं तत्ते शवसा गातुवित्तमा इन्द्रत्वोता विधेमहि.. (१६) अग्नि के जिस तेज द्वारा वरुण, मित्र, अर्यमा, अश्विनीकुमार एवं भग सबको प्रकाश देते हैं. शक्ति द्वारा स्तोत्र जानने वालों में श्रेष्ठ हम इंद्र द्वारा सुरक्षित होकर अग्नि के उसी तेज की सेवा करते हैं. (१६) ते घेदग्ने स्वाध्यो३ ये त्वा विप्र निदधिरे नृचक्षसम्. विप्रासो देव सुक्रतुम्.. (१७) हे मेधावी अग्नि देव! तुम मनुष्यों के साक्षी एवं शोभन कर्म वाले हो. जो बुद्धिमान् ऋत्विज् तुम्हें धारण करते हैं, वे शोभन ध्यान वाले बनते हैं. (१७) त इद्देदिं सुभग त आहुतिं ते सोतुं चक्रिरे दिवि. त इद्वाजेभिर्जिग्युर्महद्धनं ये त्वे कामं न्येरिरे.. (१८) हे शोभनधन वाले अग्नि! वे ही यजमान तुम्हारे यज्ञ के लिए वेदी बनाते हैं, तुम्हें आहुति देते हैं, दीप्तिशाली दिन में सोमरस निचोड़ते हैं एवं बल द्वारा विशाल संपत्ति जीतते हैं, जो तुम्हारे प्रति अभिलाषा रखते हैं. (१८) eBook converter DEMO Watermarks*