भारतकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

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पृष्ठ 1227

भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा उत प्रशस्तयः.. (१९) हव्यों द्वारा तृप्त अग्नि हमारे लिए कल्याणकारी हो. हे शोभन धन वाले अग्नि! तुम्हारा दान हमारा कल्याण करने वाला हो. तुम्हारा यज्ञ और तुम्हारी स्तुतियां हमें कल्याण दें. (१९) भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये येना समत्सु सासहः. अव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धतां वनेमा ते अभिष्टिभिः.. (२०) हे अग्नि! संग्राम में हमारे प्रति अपना मन शोभन बनाओ. उस मन के द्वारा तुम युद्धों में शत्रुओं को पराजित करो. तुम दूसरों को पराजित करने वाले शत्रुओं के महान् बल को नीचा दिखाओ. हम हव्यों और स्तोत्रों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. (२०) ईळे गिरा मनुर्हितं यं देवा दूतमरतिं न्येरिरै. यजिष्ठं हव्यवाहनम्.. (२१) प्रजापति मनु द्वारा स्थापित अग्नि की मैं स्तुति करता हूं. सर्वाधिक यज्ञकर्त्ता, हव्य वहन करने वाले एवं ईश्वर अग्नि को देवों ने दूत बनाकर भेजा. (२१) तिग्मजम्भाय तरुणाय राजते प्रयो गायस्यग्नये. यः पिंशते सूनृताभिः सुवीर्यमग्निर्घृतेभिराहुतः.. (२२) हे स्तोता! तेज ज्वालाओं वाले, नित्य तरुण एवं सुशोभित अग्नि के प्रति हव्य-अन्न से संबंधित गाना गाओ. वे अग्नि शोभन एवं सत्य वचनों की स्तुति सुनकर एवं घृत की आहुति पाकर स्तोता को शोभन वीर्य देते हैं. (२२) यदी घृतेभिराहुतो वाशीमग्निर्भरत उच्चाव च. असुर इव निर्णिजम्.. (२३) घृत के द्वारा बुलाए हुए अग्नि जिस समय ऊपर तथा नीचे शब्द करते हैं, उस समय वे शक्तिशाली सूर्य के समान अपना रूप प्रकाशित करते हैं. (२३) यो हव्यान्यैरयता मनुर्हितो देव आसा सुगन्धिना. विवासते वार्याणि स्वध्वरो होता देवो अमर्त्यः.. (२४) प्रजापति मनु द्वारा स्थापित एवं दीप्तिशाली अग्नि अपने सुगंधि वाले मुख द्वारा हमारा हव्य देवों के पास भेजते हैं. शोभनयज्ञ वाले अग्नि यजमान को उत्तम धन देते हैं एवं देवों को बुलाते हैं वे मरणरहित एवं दीप्तिशाली हैं. (२४) यदग्ने मर्त्यस्त्वं स्यामहं मित्रमहो अमर्त्यः. सहसः सूनवाहुत.. (२५) हे बल के पुत्र, घृतों द्वारा आहूत एवं अनुकूल दीप्ति वाले अग्नि! मैं मरणधर्मा तुम्हारी उपासना से तुम्हारे समान मरणरहित हो जाऊं. (२५)